Akrur Braj yatra Story in hindi

Akrur Braj yatra Story in hindi

अक्रूर ब्रज यात्रा कहानी/कथा 

 

कंस ने अक्रूर को आज्ञा दी की तुम नंदराय के पुत्र कृष्ण और बलराम को लेकर मेरे पास आओ। क्योंकि अक्रूर ही भगवान को लेकर आ सकते हैं। जो क्रूर नही है वही तो अक्रूर है। भगवान कहते हैं जिसके ह्रदय में प्रेम है और जो क्रूर नही है वही मुझे प्रिय है। आज अक्रूर जी रथ पर स्वर होकर नन्दबाबा के गोकुल की ओर चल दिये।

 

अक्रूर जी रास्ते में सोचते जा रहे हैं- ‘मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, ऐसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है अथवा किसी सत्पात्र को ऐसा कौन-सा महत्वपूर्ण दान दिया है जिसके फलस्वरूप आज मैं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करूँगा।

 

मैं बड़ा विषयी हूँ। ऐसी स्थितियों में, बड़े-बड़े सात्विक पुरुष भी जिनके गुणों का ही गान करते रहते हैं, दर्शन नहीं कर पाते—उन भगवान के दर्शन मेरे लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं, ठीक वैसे ही, जैसे शूद्र्कुल के बालक के लिये वेदों का कीर्तन । परन्तु नहीं, मुझ अधम को भी भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होंगे ही।

 
क्योंकि जैसे नदी में बहते हुए तिनके कभी-कभी इस पार से उस पार लग जाते हैं, वैसे ही समय के प्रवाह से भी कहीं कोई इस संसार सागर को पार कर सकता है। अवश्य ही आज मेरे सारे अशुभ नष्ट हो गये। आज मेरा जन्म सफल हो गया। क्योंकि आज मैं भगवान के उन चरणकमलों में साक्षात् नमस्कार करूँगा, जो बड़े-बड़े योगी-यतियों के भी केवल ध्यान के ही विषय हैं ।

 

ब्रम्हा, शंकर, इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता जिन चरणकमलों उपासना करते रहते हैं, स्वयं भगवती लक्ष्मी एक क्षण के लिये भी जिनकी सेवा नहीं छोड़तीं, प्रेमी भक्तों के साथ बड़े-बड़े ज्ञानी थी जिनकी आराधना में संलग्न रहते हैं—भगवान के वे ही चरणकमल गौओं को चराने के लिये ग्वालबालों के साथ वन-वन में विचरते हैं। वे ही सुर-मुनि –वन्दित श्रीचरण गोपियों के वक्षःस्थल पर लगी हुई केसर से रँग जाते हैं, चिन्हित हो जाते हैं, मैं अवश्य-अवश्य उनका दर्शन करूँगा।

 

मरकतमणि के समान सुस्निग्ध कान्तिमान् उसनके कोमल कपोल हैं, तोते की ठोर के समान नुकीली नासिका है, होंठों पर मन्द-मन्द मुसकान, प्रेमभरी चितवन, कमल-से-कोमल रतनारे लोचन और कपोलों पर घुँघराली अलकें लटक रही हैं। मैं प्रेम और मुक्ति के परम दानी श्रीमुकुन्द के उस मुखकमल का आज अवश्य दर्शन करूँगा।

 
क्योंकि हरिन मेरी दायीं ओर से निकल रहे हैं । भगवान विष्णु पृथ्वी का भार उतारने के लिये स्वेच्छा से मनुष्य की-सी लीला कर रहे हैं! वे सम्पूर्ण लावण्य के धाम हैं। सौन्दर्य की मूर्तिमान् निधि हैं। आज मुझे उन्हीं का दर्शन होगा! अवश्य होगा! आज मुझे सहज में ही आँखों का फल मिल जायगा।

 
इसमें सन्देह नहीं कि आज मैं अवश्य ही उन्हें देखूँगा। वे बड़े-बड़े संतों और लोकपालों के भी एकमात्र आश्रय हैं। सबके परम गुरु हैं। और उनका रूप-सौन्दर्य तीनों लोकों के मन को मोह लेने वाला है। जो नेत्रवाले हैं उनके लिये वह आनन्द और रस की चरम सीमा है। इसी से स्वयं लक्ष्मीजी भी, जो सौन्दर्य की अधीश्वरी हैं, उन्हें पाने के लिये ललकती रहती हैं। हाँ, तो मैं उन्हें अवश्य देखूँगा। क्योंकि आज मेरा मंगल-प्रभात है, आज मुझे प्रातःकाल से ही अच्छे-अच्छे शकुन दीख रहे हैं ।

 
जब मैं उन्हें देखूँगा तब सर्वश्रेष्ठ पुरुष बलराम तथा श्रीकृष्ण के चरणों में नमस्कार करने के लिये तुरंत रथ से कूद पडूँगा। उनके चरण पकड़ लूँगा। ओह! उनके चरण कितने दुर्लभ हैं! बड़े-बड़े योगी-यति आत्म-साक्षात्कार के लिये मन-ही-मन अपने ह्रदय में उनके चरणों की धारणा करते हैं और मैं तो उन्हें प्रत्यक्ष पा जाऊँगा और लोट जाऊँगा उन पर। उन दोनों के साथ ही उनके वनवासी सखा एक-एक ग्वालबाल के चरणों की भी वन्दना करूँगा ।

 
मेरे अहोभाग्य! जब मैं उनके चरण-कमलों में गिर जाऊँगा, तब क्या वे अपना करकमल मेरे सिरपर रख देंगे ? उनके वे करकमल उन लोगों को सदा के लिये अभयदान दे चुके हैं, जो कामरूपी साँप के भय से अत्यन्त घबड़ाकर उनकी शरण चाहते और शरण में आ जाते हैं। इन्द्र तथा दैत्यराज बलि ने भगवान के उन्हीं करकमलों में पूजा की भेंट समर्पित करके तीनों लोकों का प्रभुत्व—इन्द्रपद प्राप्त कर लिया।

 
फिर अक्रूर जी सोचते हैं की कंस ने मुझे यहाँ भेजा है, कहीं भगवान मुझे अपना शत्रु न समझ लें।
फिर कहते हैं- राम-राम! वे ऐसा कदापि नहीं समझ सकते। क्योंकि वे निर्विकार हैं, सम हैं, अच्युत हैं, सारे विश्व के साक्षी हैं, सर्वज्ञ हैं, वे चित्त के बाहर भी हैं और भीतर भी। वे क्षेत्रज्ञ रूप से स्थित होकर अन्तःकरण की एक-एक चेष्टा को अपनी निर्मल ज्ञान-दृष्टि के द्वारा देखते रहते हैं । तब मेरी शंका व्यर्थ हैं। अवश्य ही मैं उनके चरणों में हाथ जोड़कर विनीतभाव से खड़ा हो जाऊँगा। वे मुसकराते हुए दयाभरी स्निग्ध दृष्टि से मेरी ओर देखेंगे। उस समय मेरे जन्म-जन्म के समस्त अशुभ संस्कार उसी क्षण नष्ट हो जायँगे और मैं निःशंक होकर सदा के लिये परमानन्द में मग्न हो जाऊँगा ॥

 
मैं उनके कुटुम्ब का हूँ और उनका अत्यन्त हित चाहता हूँ। उनके सिवा और कोई मेरा आराध्यदेव भी नहीं है। ऐसी स्थिति में वे अपनी लंबी-लंबी बाँहों से पकड़कर मुझे अवश्य अपने ह्रदय से लगा लेंगे। अहा! उस समय मेरी तो देह पवित्र होगी ही, वह दूसरों को पवित्र करने वाली भी बन जायगी और उसी समय—उनका आलिंगन प्राप्त होते ही—मेरे कर्ममय बन्धन, जिनके कारण मैं अनादिकाल से भटक रहा हूँ, टूट जायँगे । जब वे मेरा आलिंगन कर चुकेंगे और मैं हाथ जोड़, सिर झुकाकर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा। तब वे मुझे ‘चाचा अक्रूर!’ इस प्रकार कहकर सम्बोधन करेंगे। और फिर मेरा जीवन सफल हो जायेगा।

 

फिर मैं उनके सामने विनीत भाव से सिर झुकाकर खड़ा हो जाऊँगा और बलरामजी मुसकराते हुए मुझे अपने ह्रदय से लगा लेंगे और फिर मेरे दोनों हाथ पकड़कर मुझे घर के भीतर ले जायँगे। वहाँ सब प्रकार से मेरा सत्कार करेंगे। इसके बाद मुझसे पूछेंगे कि ‘कंस हमारे घरवालों के साथ कैसा व्यवहार करता है ?
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