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Jarasandh Death(Vadh) story in hindi

Jarasandh Death(Vadh) story in hindi

जरासंध वध कहानी/कथा

 

एक दिन की बात है, द्वारकापुरी में राजसभा में एक नया मनुष्य आया। उस मनुष्य ने भगवान कृष्ण को बताया की जरासंध ने बीस हजार राजाओं को बंधी बना लिया है क्योंकि उन्होंने जरासन्ध के दिग्विजय के समय उसके सामने सिर नहीं झुकाया था। उन्होंने आपसे प्रार्थना की है की आप उनकी रक्षा करें। आप बड़े बलवान् हैं। जरासन्ध आदि कोई दूसरे राजा आपकी इच्छा और आज्ञा के विपरीत हमें कैसे कष्ट दे रहे हैं, यह बात हमारी समझ में नहीं आती। इसलिये आप कृपा करके अवश्य ही हमें इस क्लेश से मुक्त कीजिये ।

दूत ने कहा—भगवन्! जरासन्ध के बंदी नरपतियों ने इस प्रकार आपसे प्रार्थना की है। वे आपके चरणकमलों की शरण में हैं और आपका दर्शन चाहते हैं। आप कृपा करके उन दोनों का कल्याण कीजिये ।

 

जिस समय दूत ये सब कह रहा था उसी समय देवर्षि नारद जी वहां पर आ गए। भगवान ने नारद को आसान देकर पूछा- “देवर्षे! इस समय तीनों लोकों में कुशल-मंगल तो है न” ? आप तीनों लोकों में विचरण करते रहते हैं, इससे हमें बहुत बड़ा लाभ है कि घर बैठे सबका समाचार मिल जाता है। हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि युधिष्ठिर आदि पाण्डव इस समय क्या करना चाहते हैं ?’

 

देवर्षि नारदजी ने कहा- प्रभु! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझसे पूछ रहे हैं ये आपका बड़पन हैं फिर भी आप मनुष्यों की-सी लीला का नाट्य करते हुए मुझसे पूछ रहे हैं। आपके फुफेरे भाई और प्रेमी भक्त राजा युधिष्ठिर क्या करना चाहते हैं, यह बात मैं आपको सुनाता हूँ। युधिष्ठिर जी को सब कुछ प्राप्त है फिर भी वे श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय के द्वारा आपकी प्राप्ति के लिये आपकी आराधना करना चाहते हैं। आप कृपा करके उनकी इस अभिलाषा का अनुमोदन कीजिये ।

 

 उस श्रेष्ठ यज्ञमें आपका दर्शन करने के लिये बड़े-बड़े देवता और यशस्वी नरपतिगण एकत्र होंगे । सभा में जितने यदुवंशी बैठे थे, वे सब इस बात के लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे थे कि पहले जरासन्ध पर चढ़ाई करके उसे जीत लिया जाय। अतः उन्हें नारदजी की बात पसंद न आयी।

 

तब भगवान श्रीकृष्ण ने तनिक मुसकराकर बड़ी मीठी वाणी में उद्धवजी से कहा— “उद्धव! तुम मेरे हितैषी सुहृद हो अब तुम्हीं बताओ कि इस विषय में हमें क्या करना चाहिये।

 

उद्धव जी कहते हैं- भगवन्! देवर्षि नारदजी ने आपको यह सलाह दी है कि फुफेरे भाई पाण्डवों के राजसूय-यज्ञ में सम्मिलित होकर उनकी सहायता करनी चाहिये। उनकी बात एकदम ठीक है और साथ ही यह भी ठीक है कि शरणागतों की रक्षा अवश्य कर्तव्य है। केवल जरासन्ध को जीत लेने से ही हमारा उद्देश्य सफ़ल हो जायगा, साथ ही उससे बंदी राजाओं को मुक्ति और उसके कारण आपकी सुयश की भी प्राप्ति हो जायगी। राजा जरासन्ध बड़े-बड़े लोगों के भी दाँत खट्टे कर देता है; क्योकि दस हजार हाथियों का बल उसे प्राप्त है। उसे यदि हरा सकते हैं तो केवल भीमसेन, क्योंकि वे भी वैसे ही बली हैं ।

 

उसे आमने-सामने के युद्ध में एक वीर जीत ले, यही सबसे अच्छा है। सौ अक्षौहिणी सेना लेकर जब वह युद्धके लिये खड़ा होगा, उस समय उसे जीतना आसान न होगा। जरासन्ध बहुत बड़ा ब्राहाणभक्त है। यदि ब्राह्मण उससे किसी बात की याचना करते हैं, तो वह कभी कोरा जवाब नहीं देता । इसलिये भीमसेन ब्राह्मण के वेष में जायँ और उससे युद्ध की भिक्षा माँगे। भगवन्! इसमें सन्देह नहीं कि यदि आपकी उपस्थिति में भीमसेन और जरासन्ध का द्वन्दयुद्ध हो, तो भीमसेन उसे मार डालेंगे।  जब इस प्रकार आप जरासन्ध का वध कर डालेंगे, तब कैद में पड़े हुए राजाओं की रानियाँ अपने महलों में आपकी इस विशुद्ध लीला का गान करेंगी कि आपने उनके शत्रु का नाश कर दिया और उनके प्राणपतियों को छुड़ा दिया।

 

उद्धवजी की यह सलाह सब प्रकार से हितकर और निर्दोष थी। देवर्षि नारद, यदुवंश के बड़े-बूढ़े और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उनकी बात का समर्थन किया। अब अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण ने वसुदेव आदि गुरुजनों से अनुमति लेकर दारुक, जैत्र आदि सेवकों को इन्द्रप्रस्थ जाने की तैयारी करने के लिये आज्ञा दी । इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यदुराज उग्रसेन और बलरामजी से आज्ञा लेकर बाल-बच्चों के साथ रानियों और उनके सब सामानों को आगे चला दिया और फिर दारुक के लाये हुए गरुड़ध्वज रथ पर स्वयं सवार हुए। और भगवान चलने की तयारी करते हैं।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने जरासन्ध के बंदी नरपतियों के दूत को अपनी मधुर वाणी से आश्वासन देते हुए कहा—‘दूत! तुम अपने राजाओं से जाकर कहना—डरो मत! तुम लोगो का कल्याण हो। मैं जरासन्ध को मरवा डालूँगा’ । भगवान की ऐसी आज्ञा पाकर वह दूत गिरिव्रज चला गया और नरपतियों को भगवान श्रीकृष्ण का सन्देश ज्यों-का-त्यों सुना दिया। वे राजा भी कारागार से छूटने के लिये शीघ्र-से-शीघ्र भगवान के शुभ दर्शन की बाट जोहने लगे।

 

भगवान मुकुन्द मार्ग में दृषद्वती एवं सरस्वती नदी पार करके पांचाल और मत्स्य देशों में होते हुए इन्द्रप्रस्थ जा पहुँचे। जब युधिष्ठिर जी को भगवान के आने का समाचार मिला तो वे पहले नही समा रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण को देखकर राजा युधिष्ठिर का हदय स्नेहातिरेक से गद्गद हो गया। उन्हें बहुत दिनों पर अपने प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण को देखऩे का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। अतः वे उन्हें बार-बार अपने ह्रदय से लगाने लगे। राजा युधिष्ठिर अपनी दोनों भुजाओं से उसका आलिंगन करके समस्त पाप-तापों से छुटकारा पा गये। नेत्रों में आँसू छलक आये, अंग-अंग पुलकित हो गया। फिर भीम ने अपने ममेरे भाई श्रीकृष्ण का आलिंगन किया। नकुल, सहदेव और अर्जुन ने भी अपने परम प्रियतम और हितैषी भगवान श्रीकृष्ण का बड़े आनन्द से आलिंगन प्राप्त किया। उस समय उनके नेत्रों में आँसुओं की बाढ़-सी आ गयी थी । अर्जुन ने पुनः भगवान श्रीकृष्णका आलिंगन किया, नकुल और सहदेव ने अभिवादन किया और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों और कुरुवंशी वृद्धों को यथायोग्य नमस्कार किया । 

 

 इस प्रकार परमयशस्वी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुहृद-स्वजनों के साथ सब प्रकार से सुसज्जित इन्द्रप्रस्थ नगर में प्रवेश किया। उस समय लोग आपस में भगवान श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते चल रहे थे ।

 

इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण राजपथ से चल रहे थे। स्थान-स्थान पर बहुत-से निष्पाप धनी-मानी और शिल्पजीवी नागरिकों ने अनेकों मांगलिक वस्तुएँ ला-लाकर उनकी पूजा-अर्चा और स्वागत सत्कार किया । अन्तःपुर की स्त्रियाँ भगवान श्रीकृष्ण को देखकर प्रेम और आनन्द से भर गयीं। उन्होंने अपने प्रेमविह्वल और आनन्द से खिले नेत्रों के द्वारा भगवान का स्वागत किया और श्रीकृष्ण उनका स्वागत-सत्कार स्वीकार करते हुए राजमहल में पधारे ।

 

जब कुन्ती ने अपने त्रिभुवनपति भतीजे श्रीकृष्ण को देखा, तब उनका ह्रदय प्रेम से भर आया। वे पलँग से उठकर अपनी पुत्रवधू द्रौपदी के साथ आगे गयीं और और भगवान श्रीकृष्ण को ह्रदय से लगा लिया ।   भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ कुन्ती और गुरुजनों की पत्नियों का अभिवादन किया। उनकी बहिन सुभद्रा और द्रौपदी ने भगवान को नमस्कार किया । अपनी सास कुन्ती की की प्रेरणा से द्रौपदी ने वस्त्र, आभूषण, माला आदि के द्वारा रुक्मिणी, सत्यभामा, भद्रा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्राविन्दा, लक्षमणा और परम साध्वी सत्या—भगवान श्रीकृष्ण की इन पटरानियों का तथा वहाँ आयी हुई श्रीकृष्ण की अन्यान्य रानियों का भी यथायोग्य सत्कार किया । धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण को उनकी सेना, सेवक, मन्त्री और पत्नियों के साथ ऐसे स्थान में ठहराया जहाँ उन्हें नित्य नयी-नयी सुख की सामग्रियाँ प्राप्त हों ।

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