Narsi Mehta Story/Katha in Hindi | नरसी मेहता की कथा/कहानी |

अरे दादा मेरी सहूलियत नहीं थी इस बार हम कर रहे हैं और आपके लिए तो बड़े छोटे सब समान है। तत्वज्ञान देने की जरूरत नहीं है। मैं ये सब मेरे पेट में भरकर बैठा हूँ।
अरे दादा ऐसा मत बोलो हम गरीब है।
मैं तुझे कह देता हूँ कि तेरा मेरा कोई संबंध नहीं है। तुम्हारे जैसे यजमान की जरूरत नहीं है। मुझे तुम्हारा कुल ब्राह्मण नहीं रहना है। तो दादा ऐसा करो एक कागज पर लिख कर दे दो कि नरसैया मेरा यजमान नहीं और मैं उनका कुल ब्राह्मण नहीं नीचे हस्ताक्षर कर दो। अरे भुद्रा कहाँ गया। पोते का नाम भुद्रा है। वो लड़का जिसने दरवाजा बंद किया था वो अंदर गरियो फेरवतो हतो। अरे वो गरिया रख भुद्रा।
दादा दादा बोलो।

एक कागज का टुकड़ा ला और पेंसिल ला। लड़का दे आया पेढ़ी पर लिखा नरसिंह मेहता मेरा यजमान नहीं मैं उसका ब्राह्मण नहीं। नीचे दादा ने बड़े बड़े अक्षर में खुद का नाम लिखा और हस्ताक्षर किए और ऊपर से चिठ्ठी नीचे फेंकी है। ठाकुरजी वो चिट्ठी लेकर अंगरखा के धागे से बांध ली। ब्राह्मण देवता ने मना कर दिया। यहाँ रसोई की सुगंध फैल रही है और नागर गृहस्थ अपने पोते को बुलाकर पूछते हैं बच्चो जरा देख कर आओ तो वो सब अतिथि आये थे वो सब क्या है?

बच्चे देखने गए। आकर बोले दादा! गजब है ऐसी रसोई तो हमने कभी देखी नहीं और जैसे जैसे लड्डू की खुश्बू से भूख जाग रही है। हाँ दादा गजब है। आज यहाँ फायदा उठा लेना चाहिए। तो बेटा तेरी दादी माँ को बोल कि मेहति के पास जा कर विवेक करे कि कोई काम हो तो बताइए। जा तेरी दादी माँ को बोल।
संबंध निकालने लगे साहेब।

सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति॥

दादी माँ से बात की है। घर घर पोते बच्चे पहुंचे हैं। दादी माँ हमारे दादा ने कहा है कि मेहता के घर आज बहुत बड़ा प्रसंग है। हमे विवेक करनी चाहिए मेहति के पास जाकर पूछें कुछ काम हो तो। सात आठ दादी माँ मिल कर गई है।

यहाँ मेहता जी भी निकले हैं ब्राह्मण का क्या करे। उसमें एक पवित्र हृदय वैष्णव नागर खेती करता है। मैली जनोई धारण की है कंधे पर हल लेकर सुथार के यहाँ कुछ ठीक करवाने जा रहा था और मेहताजी को देखकर हल को रखकर जैसे लकड़ी पड़ी हो वैसे मेहता के पैर पकड़े।उसे पता नहीं था कि ये मेहताजी नहीं है वो तो पूरे जगत का नाथ है। मेरे बाप मुझे आज आपके दर्शन ।
ब्राह्मण देवता हो बोले हाँ! मेरे पिताजी का श्राद्ध है ये दादाजी है मूल बाप दादा है वो तो व्यस्त हैं इसलिए स्वाभाविक है उनकी इच्छा है कि वो हमारे घर नहीं आ सकते। आप मेरे पिताजी के श्राद्ध में दो श्लोक बोलेंगे तो हमारा उत्सव हमारा प्रसंग।

अरे मारा बाप मुझे श्लोक आते नहीं। मैं ब्राह्मण तो हूँ लेकिन पूरा गायत्री मंत्र मुझे नहीं आता। नमः शिवाय भी गलत बोलता हूँ लेकिन शंकर को एक लोटा जल चढ़ा दिया करता हूँ और आपको बहुत स्मरण करता हूँ मेहताजी। आज मेरे पुण्य जागे है। लेकिन आप मेरे घर आओ लेकिन बापजी मुझे विधि नहीं आती।
कुछ नहीं आता तो कोई बात नहीं राधा वल्लभ बोलना। दोनो जिद पर अड़ गए। ठाकुरजी हाथ पकड़कर ले गए घर।

मेहति! ब्राह्मण दादा आये हैं। बड़े दादा तो busy है। दादा के लिए सोने का पटरी लाओ। सोने न पातलो?
एक सोने की बाली को बेचा है और ये सोने के पाटे की दातारी सूझ रही है। मेहति असमंजस में है। भगवान सोचते है बात भी ठीक है। मेहति आप ठाकुरजी के मंदिर में देखो ना कोने में वहां सोने के जो पाटे रखे हैं उसमें से दो पाटे ले आओ ना। एक पर दादा बैठेंगे और दूसरे पर पूजा की सामग्री रखने के लिए।
गुस्सा बहुत आ रहा है सोने के पाटे! लेकिन फिर मन में सोचा कि जब हम कहीं के नही रहते तब तो ये कोना ही होता है जहाँ ठकोरजी बिराजमान है। नमः प्रभु श्री गिरिराज धारी। वो संकोच से दुखी होकर जहाँ ठकोरजी का मंदिर है वहां गई है मेहति देखा कि सोने के पाटे की ढेर है। बहुत आश्चर्य हो रहा है लेकिन नजर से सब दिख रहा है। दो पाटे लाकर दिए हैं। मेहताजी के सामने गुस्से से देख भी रही है कि ये सब था। बापजी बैठो। वो ब्राह्मण बोले कि मुझे ये पाटे पर बैठना नहीं आता। हम तो सेढा पर बैठने वाले आदमी है। नहीं नहीं बापजी बैठो।
मेहति वो पूजा की सामग्री जो है जो सोने के डिब्बों में केसर भरा है कश्मीर से मंगवाया है। वो पाटला का अनुभव किया तो विश्वास थोड़ा गई है लेने देखा तो सोने के डिब्बों में केसर। मैसूर से चंदन आया है। वहाँ कुछ हलचल हुई है ठाकुरजी मेहता के रूप में उनका ध्यान गया कि कौन है?
अरे बच्चों कौन है कौन आया है। हमारी दादी माँ सब आई है कुछ काम हो तो। बुलावो बुलावो वो बूढ़ी दादी माँ सब पुराने कपड़ों में किसी के फटे हुए कपड़े आये हैं और ठाकुरजी ने कहा मेहति ये दादी माँ सब आये हैं हमारे घर प्रसंग है। अरे माताजी हमारे घर प्रसंग और आप ऐसे वस्त्र। अरे मेहताजी हम तो पूछने आये थे हम अभी तैयार हो कर आते हैं। नहीं नहीं अब वापस नहीं लौटना। आप एक काम करो मेहति कांचीपुरम से जो साड़ीयां आई है। जो दायीं तरफ़ साड़ीयों का ढेर है उसमें सोने की बॉर्डर लगी है और उस तरफ बनारस की साड़ियां है बायीं तरफ उसमें से एक एक साड़ी ले आओ। लेकिन वो अनुभव किया था ना तो देखा साड़ीयो का ढेर पड़ा है। जो नहीं देखा नहीं सुना जो मनहुँ न समाये।
ईश्वर की लीला वही जाने। वो साड़ियां दी है। सब दादी माँ को साड़ी दी। उसमें से एक दादी बोली कि बच्चों जो हमारे पड़ोसी आये नहीं है। उनको भी बुला ला कि जल्दी आओ और पुरानी साड़ियां पहन कर आना। इतने में सब नागर पुत्रवधू आयी है और सबको। मेहति ये दादी माँओ को एक रुद्राक्ष का मनका और फिर एक सोने का मनका और एक तुलसी का ये सब मुझे समन्वय करना है। एक रुद्राक्ष का मनका एक सोने का और एक तुलसी का वो डिब्बा है ना मेहति उसमें जो जनक सोनी ने माला बनाई है वो माला एक एक दादी माँ को लाकर दे दो। डिब्बे भी सोने के अंदर से लाकर सबको एक एक कण्ठी दी है। वहाँ तो जूनागढ़ की सब दादियां बहुएं सब आते हैं। दो तीन बच्चे भागते हुए गए हैं चौराहे पर दादा अभी तो हम छोटे है लेकिन आपने आपकी ज़िंदगी में कभी भी देखा नहीं होगा ऐसा सब है वहाँ। पूरा जूनागढ़ आया है साहेब। दो दो पाटे ब्राह्मणों को बैठने के लिए। नागर गृहस्थ पधारे हैं। एक तरफ मर्यादा से बहनों की पंगत और एक तरफ वडीलो की पंगत बैठी है। सोने के खुमचे थाल, बड़े बड़े प्लेट नहीं। बड़े बड़े थाल उसमें आठ आठ सोने के कटोरे, नौ नौ सोने की चम्मच। एक एक लीटर जमुना जल भर सके ऐसे सोने के लोटे हैं जमुना जल भरा है। उसके ऊपर सोने के ढक्कन। ऐश्वर्य की जैसे कोई सीमा नहीं।

नरसिंह मेहता के रूप में ठाकुरजी जो उनके मूल ब्राह्मण दादा को बुला लाये थे उनसे कहा कि दो मंत्र बोलो तो कार्य आरंभ हो। मैंने आपसे कहा था मुझे मंत्र नहीं आते और तुम्हारे पिताजी जहाँ पहुंचे हैं वहाँ से वापस आएंगे। अरे नहीं बापजी आप तो मुख्य अतिथि हो। आप केवल नमः शिवाय बोल दो। सच्चा झूठा गायत्री मंत्र बोलो। वो बेचारा बहुत शरमा रहा है और गांव के बड़े बुजुर्ग बैठे हैं वो मजाक उड़ाते हैं कि किसको लेकर आ गए हैं। भगवान ने कहा और ये बेचारा शरमा रहा है। ये मेहता ने क्या शुरू किया है। नहीं बापजी ॐ नमः शिवाय बोलो। एक बार राधा वल्लभ बोलो। बहुत दबाव आया तब वो किसान जो ब्राह्मण था वो राधा वल्लभ बोले। मेरे ठकोरजी ने चुटकी उंगली से उसकी जीभ पर स्पर्श किया तो
यम ब्रह्मा वरुणेंद्र रूद्र मरूत: स्तुन्वन्ति दिव्य स्तवै,
वेद: सांग पद क्रमोपनिषद गायन्ति यं सामगा:।

मेहताजी पाँच तरभाना लाओ। सब विधि कंठस्थ हो गई। जो खाना खा रहे थे उन्होंने देखा गजब निकला। मंत्रउच्चार हुए हैं। यादवो परोसने वाले के रूप धारण करके आये हैं। रसोई का संचालन जगदम्बा भवानी अन्नपूर्णा देवी कर रही है। इतनी रसोई इधर ले जाओ उतनी उधर और सबको साहेब थाल में भोजन परोसा जाता है। लाडू चूरमा के लड्डू। मुठिया तल कर कूट कर उसमें थोड़ा चने का आटा वो मिला कर उसके लड्डू। मोतीचूर लड्डू। बूंदी के लड्डू। अनेक प्रकार के लड्डू परोसे गए हैं। मूंग की दाल। उडद की दाल। चने की दाल। पानी पूरी। मेरे ठाकुर के घर कोई कमी नहीं होती। ये तो सब बाप फालतू चीजे हैं बाकी उस समय में छप्पन भोग का भोग खाने वाला ये मेरा देव है बाप और वो स्वयं नहीं खाता छोटे से छोटे आदमी तक पहुंचाता है। ये मेरा दामोदर।
जय जयकार करके ब्राह्मणों ने भोजन शुरू किया। खूब भोजन किया सबने। मेहताजी धन्य हो।
बापजी आपके आशीर्वाद।

ठाकुरजी अकेले खड़े हैं। मेहति मुझे तुमसे कुछ काम है। अब खड़ा हो वो कोई दूसरा। देवी अब मैं थक गया हूँ। मैं जरा दामा कुंड में स्नान कर आऊँ। आज तो आपने बहुत देर कर दी थी लेकिन अब जल्दी आना और द्वारिकाधीश बहाना बनाकर स्नान के बहाने निकल गए हैं।

इधर वैष्णव की आन पर अभी मूल नरसैया होश भूल कर कीर्तन कर रहे हैं। एक पद पर दूसरा पद। लोगों की जमघट लगी हुई है उसमें थोड़ा मेहताजी को होश आया। वैष्णव को पूछा शेठजी कितने बजे है।
बोले सवा बजने वाले हैं। ओ मेरे घर आज प्रसंग है जल्दी घी दे दो। वो घी की भगोनी। भगोनी में घी लेकर मेहताजी अपने घर आते हैं। मेहति से कहा देवी आप तो जानती हो मुझे होश नहीं रहता तो देर हो गई। घी लाया हूँ आप रसोई बनाओ। एक अतिथि और दीक्षित जी को बुलाया है आप रसोई बनाओ।
अब हद हो गई है। अभी आप घी लेकर आ रहे हो तो ये सब किसने किया? किसने किया?
मेहति!
हाँ, सातसौ घर जूनागढ़ के क्या पूरा जूनागढ़ सागमतु भोजन करके गए हैं और सबकी ऐसी पेहरामणि की मैं बहुत खुश हूँ लेकिन
अब तो मजाक मत करो। मेहति वो मैं था?
तो कौन? आप ही तो थे ऐसा जब कहा हाथ से घी की भगोनी छूट गई।
मेहति तो वो मैं था? तो उनके साथ आपने विवेक से बर्ताव किया या कुछ बोला है आपने?
क्यों नहीं बोलू।
मेहति वो अगर मैं था तो मुझे जवाब दो, मैं कहाँ गया?
आपने मुझसे कहा कि मैं स्नान करने जा रहा हूँ थक गया हूँ।
मेरा हरि थक गया। मेहति कहाँ तक पहुँचे होंगे? देवी वो मैं नहीं था। मैं तो अभी घी लेकर आया हूँ। आप यहां इंतेज़ार करो मैं उन्हें बुलाकर लाता हूँ। मेहता भागे है। दामा कुंड की पाल पर पहुंचते हैं। हरि तो अंतर्ध्यान हो गए और संकट समय की शंकर नरसी का केदार। आज पूरे
नगर को भोजन करवाकर जाता है और मुझे भूखा रखेगा। करताल ली है और दामा कुंड की सीढ़ियों पर मेहता ने केदार गाया है।

तू दयाल दीन हौं तू दानी हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप पुंज हारी ॥

केदार से बांध कर हरि प्रकट होते हैं। नरसी हरि के पैर में गिर जाते हैं। मेहता तुम जो कहोगे वो मैं करूँगा लेकिन पहले एक बात बताओ ये सब जो हुआ उसमें कोई भूलचूक तो नहीं हुई है ना? प्रहलाद को तारने भागवत में हरि आये तब कहते हैं कि हे प्रहलाद मुझे थोड़ी देर
हो गई बेटा यदि मैं विलंभ। तुझे बचाने में मुझे थोड़ी देर हो गई मुझे माफ़ करना।
प्रभु सबको भोजन करवाया। आप जब तक मेरे घर में भोजन नहीं करेंगे तब तक मेरे पितरो तक श्राद्ध नहीं पहुँचेगा। आप पधारो द्वारिकाधीश।सरुक्मिणी पधारते हैं साहब। फिर कथा में ऐसा सुंदर वर्णन मिलता है। यहाँ से कैलाश से शिव पार्वती पधारते है। ब्रह्मा जी ब्राह्मणी पधारे है। इन सबको लेकर मेहता अपने घर पधारे हैं। मेहति अब इनको बैठने के लिए पाटे नहीं है अपने पास।
वो तो खेल खत्म हो गया। वो लीला तो समाप्त हो गई। अब घर में टूटे फूटे आसान है वही ले आओ। उन टूटे फूटे आसान पर हरि बिराजमान हुए। द्वारिकाधीश ने मेहता से कहा कि तुम दोनों भी हमारे साथ पंगत में बैठो।
ये हरि भजने का फल है साहब।
मेहता और मेहति का आसन लगाया है और मेहता ने भगवान से विनती की प्रभु थोड़ी देर आप राह देखो। मैं अपने बड़े भाई को बुला
लाऊँ।
मेरा मानस कहता है साधु का यही बड़प्पन है कि चाहे जितना बुरा व्यवहार करें तो भी वो भला ही करते हैं।

मेरे बड़े भाई को बुला लाऊँ। मेहताजी बड़े भाई के घर जाते हैं। कोई भोजन करने नहीं आया साहब। नरसिंह मेहता आये। बोले बड़े भाई अगर आपने दो शब्द नहीं कहे होते तो मुझे साक्षात्कार कैसे होता। ये हरि की लीला का अनुभव आपकी कृपा से हुआ है। आप और भाभी मेरे घर जब तक नहीं पधारेंगे तब तक हम भी भोजन नहीं करेंगे।
हे नरसी तुम्हारा बहुत अपराध किया हमने बाप। मुझे माफ़ करना, बड़ा भाई कह रहा है।
माता पिता तुल्य बड़े भाई भाभी को लेकर और ठाकुरजी की पंगत में बड़े भाई को आसन दिया है। कुटुंब में एक अच्छा पैदा हो तो हरि की
पंगत में परिवारजनों को आसन मिलता है। एक सज्जन पुरुष। एक जलाराम बापा। एक नरसिंह मेहता। कुल को तारते हैं समाज का उद्धार करते हैं। भोजन हुआ है। देवाधिदेव बिदाई लेते हैं।

हरे राम राम राम सीता राम राम राम।।
हरे राम राम राम सीता राम राम राम।।

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