Narsi Mehta Story/Katha in Hindi | नरसी मेहता की कथा/कहानी |

नरसी मेहता के पिता के श्राद्ध की कथा यहाँ पर दी जा रही है। किस तरह से पिता के श्राद्ध में नरसी मेहता बनकर भगवान आये। ये कथा मोरारि बापू द्वारा मानस किष्किंधा अबू धाबी में कही गई। जिसे बापू ने गुजराती में कहा था लेकिन हिंदी में भावना दीदी ने रूपांतरण किया।

मेहता जूनागढ़ में भगवान का भक्त परम वैष्णव। व्याख्यानकार कहते हैं कि मैं उसकी कथा कहता हूँ। श्राद्ध का दिन। मेहता जी अपने ठाकुर जी का घर में एक कोने में छोटा सा मंदिर है। हाथ में करताल, पैरों में घुंघरू बांधकर के मेहता हरि कीर्तन में डूबा है। मेहती उसकी धर्म पत्नी घर में है और बड़े भैया सब प्रकार से सम्पन्न थे। आये। भजन गाते हुए नरसी का स्वर सुना गुस्सा आ गया। व्याख्यानकार नरसी के बड़े भाई की गति और उनकी मानसिकता का वर्णन अपनी कविता में करता है –

मन में मंसूबा करता करता नरसी के बड़े भाई जा रहे हैं न्योता देने लेकिन कवि कहता है कि लक्ष्मी का गर्व है। एक तो लक्ष्मी सम्पदा इज्जत प्रतिष्ठा और उसका घमंड है बड़े भाई और कौन सा घमंड है?

मेरी नात में सब मेरे से नीचे। मैं इतना बड़ा। आँगन में आते हैं।

मेहता भजन में थे उसको पता नहीं। सुबह में आये तो भी कीर्तन, दोपहर को आये तो भी कीर्तन शाम में आये तो भी कीर्तन। बस करताल के सिवा कोई धंधा ही नहीं अपमानित शब्दों में बोलने लगे। पिता का श्राद्ध है। तुम दोनों आ जाना। इतना ये करना, इतना ये करना। हम तो सब कर ही रहे हैं और आपको न बुलाऊँ तो इज्जत का प्रश्न है तुमको तो कुछ करना नहीं, पिता तो तुम्हारा भी है। अपमानित शब्द बोले।

मेहता को पता नहीं है। वो भजन में डूबे हैं। नरसी मेहता की धर्म पत्नी ने सुन लिया। अब कुल की मर्यादा है। मैं तो चोरा की लाज रख रही हूँ जो बात थी। कमरे का दरवाजा थोड़ा टेढ़ा किया और तिराड में से बड़ा भाई दिख रहे थे घूंघट निकाले हुए – बडे भाई! माफ करना, आपके सामने मैं पहली बार बोल रही हूँ। पहले तो मुझे ये जानना है कि मेरा पति हरि भजन करते हैं वो क्या गुनाह है? ये कोई अपराध है? और
पिता के श्राद्ध में इतना अपमान करके जो हमे बुलाना हो तो फिर बाप तो वो हमारे भी थे हम हमारी तरह श्राद्ध कर लेंगे। ऐसा बोल गई।

बड़े भाई आपको अपमान करके ही हमे बुलाना है इस बार पिताजी का श्राद्ध हम हमारी तरह से, हम गरीब हैं हमारी तरह से करेंगे।
ज्येष्ठ बंधू बोले इतना गर्व। एकदम पैर को वो करते हुए नरसी मेहता को बड़े भाई को निकलना और आखिरी शब्द नरसी मेहता के भाई के कान में आता है।
ज्येष्ठ बंधु को पैर से शिखा तक लग गई चोट। तुम्हारी ये हिम्मत। ठाकुरजी के मंदिर में कीर्तन में लीन।

आखरी वाक्य मेहता ने सुना कि मेहति ने कुछ कहा। बड़े भाई गुस्से में चले गए।
राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण। बाहर आये तब तक बड़े भाई चल दिये।

मेहती! बड़े भाई आये थे?
हाँ।
तुम उनके सामने कुछ बोल रही थी?

मुझे माफ़ करना मैंने आज तक कुछ बोला नहीं लेकिन कब तक सहन करेंगे। आप हरि भजते हो ये कोई अपना गुनाह है? इतना
अपमान करके जो भोजन करायेंगे तो फिर उसका अर्थ ऐसा होता है कि हम अपने तरीके से श्राद्ध कर ले।

अरे मूर्ख! वो अपने पिताजी समान है। वो दो शब्द कहने लायक और हम दो शब्द सुन सकते हैं। उनको पलट कर ऐसे जवाब नहीं दिया जाता। लेकिन चिंता मत करना बड़े भाई तो सब समझते हैं वो भले ऐसा बोल कर गए हो कि तुम कर लेना श्राद्ध। बड़ा भाई तो अपना है ना, हम उन्हें मना लेंगे। मेहता ने सही अर्थ ले लिया। तो मेहता जी अपनी पत्नी को समझाते हैं कि मूरख।। बड़े भाई है दो शब्द बोलेंगें और बात भी तो सच्ची है अपने घर में क्या है जो हम श्राद्ध कर सकें। हम उनकी वजह से उजले हैं।

चरण पकड़े मेहति ने कि मैंने बोल दिया है इस बार श्राद्ध हम करेंगे।

लेकिन तुझे पता है कि तीन दिन से हम ठकोरजी को भोग नहीं लगा रहे हैं। घर में कुछ नहीं है, तू भी भूखी है और मैं भी तो हम
श्राद्ध कैसे करें?

बोले पांच लोगो के जितना भी नहीं कर सकते। आप, मैं, एक दीक्षित जी, अपने कुल ब्राह्मण और पांचवें कोई भी अतिथि।
नरसी बोले – अरे हो सकता है लेकिन कहाँ से करें मेरे ठाकुर जी तीन दिन से भूखे हैं।। कैसे करें?

मेहती बोली – मुझे सब तरह से माफ करना लेकिन मैंने एक सोने की बाली संभाल कर रखी है। वो बाली बेच आओ और पाँच
लोगों के जितना अन्न ले आओ। मेहता के चेहरे पर तेज आ गया।

कहाँ है बाली, कामिनी हे कामिनी बाली कहाँ है? मुझे दे दो। कारण! भीड़ पड़े जब भक्त पर तो मारो लाजे लक्ष्मीनाथ।

लाओ लाओ। बाली थी तो ठकोरजी तीन दिन से भूखे हैं श्राद्ध होना होगा तो होगा लेकिन बाली दो। वो बाली दी है।

मेहताजी जूनागढ़ के बाजार में जाते हैं बाली बेचते हैं। पाँच लोगों को खाना खिला सके उतना आटा शक्कर सब्जी जो कुछ लेकिन उस बाली को बेचकर पांच लोगों के लिए पर्याप्त अन्न लेकिन घी रह गया। आधे घंटे में सब हाजिर किया।। लेकिन होता ऐसा है मेहताजी आते हैं। अन्न रखते हैं। अभी तक मेहति को पता नहीं चला है कि घी नहीं है वो तो प्रसन्न हो रही है। उसने मेहता को कह दिया जैसे सब व्यवस्था हो गई हो बोली आप दीक्षित जी को बोल दो। बड़े भाई के घर प्रसंग है वो वहाँ जाते हैं लेकिन आज हम गरीब के घर भी प्रसंग है आप दीक्षित जी को कह दो इस बार हमारे घर प्रसाद ग्रहण करे।

मेहताजी दीक्षित जी को बुलाने चल पड़े हैं लेकिन दीक्षित जी रास्ते में ही मिल गए।
जय राधा वल्लभ मेहताजी।। राधा वल्लाह।।। कहाँ जा रहे हो?
बोले आपके पास ही आ रहा था तो इस बार पिताजी का श्राद्ध हम कर रहे हैं और आप हमारे घर नहीं आएंगे बड़े भाई के घर तो
आप सदैव जाते हो।
ओहो मेहताजी! आपके घर पिताजी का श्राद्ध ऐसे बात करते करते टिखली दीक्षित मेहता को जूनागढ़ के एक प्रसिद्ध नागरों की जहाँ बैठक होती है उस चौराहे पर ले गए। वहाँ सब नागर बैठे हैं। मांकड़ और चांचड़ और मच्छर, हाथी, देसाई। टेढ़ी मेढ़ी पगड़ी है। अंगरखा पहना है। दोनो गालो में पान दबा रखे हैं। पैर पर पैर चढ़ा कर नागर गृहस्थ बैठे हैं। कोई सारंगधर कोई फनिधर कोई मुरलीधर कोई धरणीधर ऐसे सबके नाम है। अब दीक्षित जी मेहता को लेकर आये तो सबको मजाक सूझी कि दीक्षित जी कुछ नए समाचार है ये मेहताजी आज सुबह सुबह तो बोले – सुनो सुनो वडिलो सुनो अपने लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है कि इस बार का श्राद्ध मेहताजी अपने घर कर रहे हैं।
क्या!
ओहो धन्य हो मेहताजी और ऐसे भी हमारे सातसौ घर का निमंत्रण आ गया है बड़े भाई के घर लेकिन जो तुम्हारे घर तुम श्राद्ध कर रहे हो पिताजी का तो तुलसी के पत्ते पर जितना प्रसाद रहे उतना ही अगर आप हमें देंगे तो हम कृत्य कृत्य हो जाएंगे। बड़े भाई के निमंत्रण को ठुकरा कर हम आपके घर खाना खाने आएंगे। नरसिंह मेहताजी ने कहा दीक्षित जी तो फिर सातसौ घर को निमंत्रण दे दो।

सातसौ घर सागमतु। खुद भूल गए घी नहीं है पांच लोगों के जितना। “भक्ति वही कर सकते हैं भक्ति को वही पा सकते हैं बिसरा
तन का क्षोभ।” मेहतो भान भूल गया। भरोसा जिसको हो उसके ऐसे ही काम होते हैं। सातसौ घर को दोपहर को एक बजे सब लोग आ जाये।
मेहताजी वापस लौटे और पीछे से यही सब लोग मजाक करने लगे।

जैसे मेहता जी थोड़े दूर गए सब मजाक उड़ाने लगे कि क्या कहे फुल गए भगत का ऐसा ही स्वभाव अब उसके घर क्या कुछ होगा। हम तो बडे भाई के घर जाएंगे साहब। अपना तो सालों के संबंध है। मजाक उड़ा रहे हैं।

मेहताजी अपने घर आये और बोले दीक्षित जी को मैंने कह दिया है। उन्होंने हाँ कह दी है।
मेहति ने कहा हाँ बोल दिया उन्होंने। आएंगे फिर वो पक्का।
मेहता बोले – सिर्फ दीक्षित जी अकेले ही नहीं आएंगे तो सातसौ घर सागमते।
मेहती कहती है – अरे लेकिन। ये पांच लोगों के पर्याप्त घी नहीं है।
मेहता बोले – वो तो मुझे भी पता नहीं मुझे भी ध्यान नहीं रहा लेकिन अब मैंने बोल दिया अब कैसे पलट सकते हैं।
लेकिन घी नहीं है और तुम्हारी बात कौन मानेगा सब सोचेंगे कि ये भगत का क्या ठिकाना। कोई चिंता नहीं जाओ घी ले आओ
लेकिन मैंने कह दिया है सातसौ घर। मेहति को लगा कि इनका कौन सुनेगा। धक्का लगा है मेहति को कि क्या होगा।

कोई बात नहीं तुम्हारी बात को कोई सच नहीं मानेंगे। वो सब तो मजाक उड़ा रहे होंगे। लो ये भगोने और घी ले आओ और मेहतो हाथ में भगोना लेकर जूनागढ़ के बाज़ार में पाँच लोगों की रसोई बने उतना घी लाने निकले हैं। बाली बेचकर तो सब कु आया है लेकिन घी बाकी है और मेहताजी निकले हैं।

जूनागढ़ के व्यापारीयों ने अभी अभी दुकान खोली है। अगरबत्ती की धूप सब तरफ की है जहाँ जहाँ अगरबत्ती घुमाते है व्यापारी।

बाप! घी लेने निकले हैं। वैष्णव राक बहुत होते हैं। ताजा घी आया है बापजी। भगोना लो मेहता जी। सवा रुपये होते हैं।

नरसी कहते हैं सेठजी पैसे तो नहीं है। एक बाली थी उसको बेच दी लेकिन उसमें से घी नहीं खरीद पाया इसलिए उधार लेने आया हूँ और एक
हफ्ते में ब्याज के साथ लौटा दूँगा। वैष्णव का वचन।
सेठ जी कहते हैं -हे बापजी हफ्ता क्या आठ महीने के बाद भी पैसे दोगे तो भी तुम्हारे पास थोड़ी नकली है। लेकिन नरसी जी मुझे ख्याल आया कि सुबह जब मैं ये सब ठीक करके तुम्हारे लिए घी लेने गया तो उसके अंदर एक छिपकली गिरी हुई थी।
नरसी मेहता बोले – नहीं नहीं बापजी मुझे तो ठकोरजी को भोग लगाना होता है और ऐसा अशुद्ध घी नहीं होगा बापजी। ये आप वापस ले लो बापजी।

नहीं नहीं मेहताजी इसमें कोई बात नहीं। वो तो होशियारी कर रहा था इसके पास कहाँ से पैसे लेने जाऊँ तो ठीक है उसने वो पूरा घी वापस ले लिया। भोगोनी वापस की। दूसरी दुकान पर जाते हैं।

दूसरा कहता है लाओ लाओ बापजी घी तोल दूँ। वो फिर तोलता है और पैसे मांगे तो मेहताजी फिर यही कहते हैं। ऐसे सात आठ दुकान मेहताजी घूमे और पैसे की बात आते ही और मेहता ने उधार की बात की। घी वापस ले लिया। किसी को पूछा घड़ी में कितने बजे है शेठजी तो बोले ग्यारह बजे हैं।

आगे गति करते हैं। अब तो उसका खुद का रस्ता आ गया जहाँ से दामा कुंड नहाने जाते थे। उसमें आखिर में व्याख्यानकार
लिखते हैं –

एक वैष्णव जन नु हाल जो अने धरणी धर नु ध्यान धरे
अने मुख गोविंद गोविंद गोपाल जो धरणी धर नु ध्यान धरे।

एक वैष्णवी का हाथ है वैष्णवी तिलक लगाये है शालीन शेठ की दुकान थी। साहेब अपनी देहलीज से कूद कर वो व्यापारी नीचे उतरा। मेहताजी मेरे बाप। पैर पकड़े मेहताजी के।

अरे शेठजी आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हो।

अरे नहीं मेरे बाप आज आप मेरी दुकान पर। आप जल्दी स्नान करने जाते हैं तब तो मैंने दुकान भी नहीं खोलता और जब वापस जाते हो तब हम सब ठीक कर रहे होते हैं उसमें हमे मौका नहीं मिलता। बोलो बापजी कैसे आना हुआ?

बोले शेठजी, पिताजी का श्राद्ध है और पांच लोगों की रसोई के लिए घी कम पड़ रहा है इसलिए लेने निकला हूँ। लेकिन अब मैं साफ कर देता हूँ कि सात आठ दुकानदारो ने मुझे घी दिया लेकिन पैसे की बात आई तो वापस ले लिया। पैसे नहीं है शेठजी।
उधार दो मैं ब्याज के साथ लौटा दूंगा।

अरे मेरे बाप! आपका बाप वो हमारा भी बाप है। हम आपके गाँव के हैं। पैसे की जरूरत नहीं है बापजी। हो तो देना। लेने तो नहीं है लेकिन आप ऐसे लोगे नहीं इसलिए कह रहा हूँ। पैसे की कोई चिंता नहीं है बापजी। मैं आपको घी देता हूँ।
मेहताजी ने कहा कि मैं घी तभी लूँगा कि जब मैं देने आऊँ तब पैसे लेने पड़ेंगे।
वो व्यापारी कहता है नहीं, मैं नहीं लूंगा पैसे और मेहताजी कहते हैं मैं मुफ्त में नहीं लूँगा। अब करे क्या?
व्यापारी ने कहा बापजी एक काम करो आपको ऐसा लगता है कि मुफ्त में ले लिया ऐसा न लगे इसलिए एक काम करो ना एक दो पद सुना दो ना। एक कीर्तन सुना दो तो आपको ऐसा नहीं लगेगा कि आपने मुफ्त में लिया है और बापजी भजन जैसी कीमत कौन चुकाएगा? आप मुझे भजन दे दो इससे बड़ा मूल्य क्या होगा।
अब मेहताजी को कोई भजन गाने के लिए कहे तो भादवा।
भादवे की जगह श्राद्ध श्राद्ध की जगह सब इधर उधर पड़ा हो और वो घुघरा तो जेब में ही रखते थे। घुघरा पैर में बांधे हैं करताल। हाथ मे थी ही और एक अंगर था उसको कमर पर बांध कर और फिर मेहताजी वैष्णव के सामने कीर्तन करने लगे।
एक पद दूसरा पद पद पर पद गा रहे हैं और घड़ी के कांटे आगे बढ़ रहे हैं। मेहताजी को होश नहीं रहा। वैष्णव और वहाँ तो लोगे का जमघट लग गया साहेब। वैष्णव वृति के लोग मेहता के पद में जैसे खो गए हैं-

ऐवो धा जाने ऐने रे अमे जानें रे
अने वर राधा जी नु वखानिये रे।
राम सभा मा अमे रमवा ने ग्याता अने।

बारह बजे हैं। तरह तरह के राग गा रहे हैं नरसिंह मेहता। कोई साज की जरूरत नहीं। करताल काफी है। सब लीन हो गए भजन में। मेहति दरवाजा खोल कर बाहर आती है कि घी लेने गए हैं बारह बजे हैं अभी तक आये नहीं। बार बार घर के अंदर बाहर कर रही है। क्या हुआ होगा? कैसे होगा? मैं मूरख मुझे बड़े भाई के बोल पी जाने चाहिए था। मैं क्या उनसे बात बोली और मेरे पतिको ये सब मुश्किलें। क्या हुआ होगा? जब बहुत थक गए मेहति तब घर के कोने में दामोदर का छोटा सा मंदिर है वहाँ जा कर वैष्णव की पत्नी ढेर हो गई।
रखियो लाज हमारी हे गिरधारी अब लाज रखना। झार झार रो रही है। वैकुंठ हिलने लगा है साहेब। ठाकुरजी खड़े हो गए हैं साहब। रुक्मिणी आज मुझे क्यों अहक है। मुझे अहक हो रहा है। मुझे असुख की अनुभूति हो रही है।
बोली ठाकुर मुझे भी ऐसा ही लग रहा है। आज कोई भक्त पीड़ा में तो नहीं है। जो ठकोरजी ने देखा है वहाँ तो मेहता भजन गा रहे हैं और मेहति ठकोरजी के चरणों में रुदन कर रही है। उद्धव, अक्रूर, यादवो, पार्षदों, गरुड़ जैसे जैसे नाम पुकार रहे हैं सब इकट्ठे हो गए हैं। क्या हुआ प्रभु?
तैयारी करो सीधा सामग्री ले कर जूनागढ़ की भूमि पर पहुंच जाओ। कोठी भर भर ले चलो और मैं भी गरुड़ की सवारी पर आ रहा हूँ। ये तो ठाकुरजी का खेल है साहब। कोठी भर भर के सब उतरे हैं जूनागढ़ की भूमि पर।
अभी उस चौराहे पर बैठे हैं ।
किसी ने कहा ये सब क्या है? अरे बच्चे जरा पूछ कर आ कि ये सब लोग कौन है? एक बच्चा पूछने गया कि अतिथियों परदेसीयो आप सब कौन हो?
बोले हम नरसिंह मेहता के नौकर है।
हें?
आज उनके पिताजी का श्राद्ध है थोड़ी देर हो गई हम सीधा सामग्री लेकर आए हैं और वो गए हैं। बहुत बडी खुली जगह पर डेरा तंबू लगा दिये हैं। ये तो संकल्प में से सृष्टि उत्पन्न होती है ऐसा हरि का खेल था। नागर गृहस्थ सोच रहे हैं कि गजब है ये आदमी कोई बड़ा यजमान ढूंढ़ लिया है। दीक्षित जी मंत्रणा करनी पड़ेगी कि किसके घर जाये खाना खाने? ये दुनिया है और ये ठकोरजी के मंसूबे साहब उसके मनोरथ अनिह इच्छा आज धारण करती है। इच्छा मुक्त ब्रह्म आज इच्छा को धारण कर मैदान में क्रीड़ा करने निकले हैं और यहाँ भोजन की तैयारी शुरू हुई। अग्नि देव स्वयं प्रकट हो गए। वायु देव रसोई को ठंडा कर रहे हैं। यहाँ वरुणदेव स्वयं पानी भर रहे हैं। यहां गंगा यमुना नदी आने लगी और सब तीर्थ पधारे हैं। अन्न देव स्वयं सामग्री मसाले डाल रहे हैं और ऐसी रसोई बनी कि उसकी खुशबू जूनागढ़ के प्रदेश में एक एक योजन मतलब चार चार गाँव में बिलखा तक। । चारो ओर सुगंध फ़ैल गई। सबके नाक काम पर लगे हैं। घ्राणेन्द्रिय काम करने लग गई है। ऐसी रसोई ऐसी खुशब। यहाँ तड़का लग रहा है सब्जी का अन्न देव। सब देव और देवियां कोई बर्तन उठा रहे हैं। कोई बुहारी निकाल कर पंगत साफ कर रहे हैं। ये सब होने लगा है साहब। यहाँ ठाकुरजी सबको भेज कर कहा कवि लिखता है कि

सेवक तारजे आज आव्या देवाधिश देवजी अने भागोले रे आवी रे भूधर अने लीधु ऐने नरसैया नु रूप जी। कारण?

भक्तवत्सल भगवान। घुटने तक की धोती पहनी हुई है ठाकुरजी ने हाथ में भगोनी है। करताल है। कसुबन्द अंदर पहना है। तुलसी की माला नरसैया का रूप धारण किया है। ठकोरजी ने। द्वारिकाधीश आये हैं। मेहति राह देख रही है। यहाँ ठकोरजी नरसैया के रूप में आये और बोले लो ये घी। एक तो मेहति दुखी थी और इतनी देर लगा दी तो स्वाभाविक है कोई भी हो उसको गुस्सा आएगा और मेहति ने डांटना शुरू किया कुछ होश है आपको द्वारिकाधीश को कह रही है कि आपको कुछ होश है।

उसने कहा होश होता तो आता क्यों? होश वालो ने तो सबने भगोनी में से घी घिस घिस कर वापस ले लिया। यहां अभी तो वार्तालाप चल रहा है लेकिन आप अपने कूल ब्राह्मण को तो बोल देते। अभी आपने उनको कहा ही नहीं आप जाओ।
ठाकुरजी को लगा यहाँ ज्यादा देर खड़े रहना नहीं चाहिए नहीं तो ये मेहति बहुत गुस्से में है। भगवान स्वयं अपने कूल ब्राह्मण को निमंत्रण देने जाते हैं नरसी के रूप में।

मकान ऊपर माढ़ मेडी और एक छोटी सी खिड़की वहाँ वो कूल ब्राह्मण बैठे हैं। बहुत अच्छी तबियत वाले। लम्बोदराय, बहुत ज्यादा अच्छी तबियत है पान खा रहे हैं। खिड़की से देख रहे हैं बाज़ार की तरफ। इतने में ठकोरजी पधारते है। ब्राह्मण देवता को लगा उनके बेटे के बेटे को आवाज लगाई ओ सुनो। बोले हाँ दादाजी। बोले वो भगत आ रहे हैं।

सुना है अपने पिताजी का श्राद्ध इस बार अपने घर कर रहे हैं। आज तक नहीं किया इस बार हमारे पैर पकड़ कर हमे शर्मिंदा करेंगे। दरवाजा बंद कर दे। हम तो बड़े भाई के घर ही होगा। नीचे से दरवाजा बंद कर दे। सांकल लगा कर कील लगा दे। सांकल लगा कर दरवाजा बंद किया है।

भगवान ने सोचा तुम तुम्हारा दरवाजा बंद नहीं कर रहे लेकिन अपने भाग्य का दरवाजा बंद कर रहे हो, ब्राह्मण देवता।

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