Mahabharat : Jayadrath Vadh Story/Katha in hindi

Mahabharat : Jayadrath Vadh Story/Katha in hindi

महाभारत : जयद्रथ वध की कहानी/कथा

तेहरवें दिन के युद्ध में अभिमन्यु ने वीरगति प्राप्त की। अभिमन्यु वध के बाद जब अर्जुन को पता चला तो अर्जुन काफी रोये कि मेरे पुत्र को कितनी बर्बरता से इन कौरवों ने मारा है। अर्जुन को पता चला कि इनमें जयद्रध ने सबसे पहले अभिमन्यु को पीछे से वार करके बुरी तरह घायल लिया था। अर्जुन उसी समय प्रतिज्ञा लेता है कि कल शाम होने तक मैं या तो जयद्रथ का वध कर दूंगा या फिर अग्नि में समाधि ले लूँगा।

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कौरवों को पता चला कि अर्जुन ने जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा ली है। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर जयद्रथ काँपने लगा। द्रोणाचार्य ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा व्यूह बनाएँगे कि अर्जुन जयद्रथ को न देख सकेगा। वे स्वयं अर्जुन से लड़ते रहेंगे तथा व्यूह के द्वार पर स्वयं रहेंगे। चौदहवें दिन का युद्ध शुरू हुआ। अपने आश्वासन के अनुरूप गुरु द्रोण ने जयद्रध को छिपकर रखा अर्जुन की आँखें जयद्रथ को ढूँढ रही थीं, किंतु वह कहीं नहीं मिला।

 

युद्ध करते करते काफी समय निकल गया लेकिन अर्जुन को जयद्रथ कहीं भी नहीं मिला। सन्ध्या होने ही वाली थी कि तभी श्रीकृष्ण ने अपनी माया फैला दी। सूर्य बादलों में छिप गया और सन्ध्या का भ्रम उत्पन्न हो गया। सबको लगा कि सूर्यास्त हो गया है और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अर्जुन अग्नि समाधि ले लेगा। अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा। जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले- “पार्थ! तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। वह देखो अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है। ऐसा कहकर कृष्ण ने अपनी माया समेट ली।

 

देखते-ही-देखते सूर्य बादलों से निकल आया। यह देखते ही जयद्रथ और दुर्योधन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जयद्रथ भागने लगा लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया था। तभी श्रीकृष्ण चेतावनी देते हुए बोले- “हे अर्जुन! जयद्रथ के पिता ने इसे वरदान दिया था कि जो इसका मस्तक ज़मीन पर गिराएगा, उसका मस्तक भी सौ टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा। इसलिए यदि इसका सिर ज़मीन पर गिरा तो तुम्हारे सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएँगे। हे पार्थ! उत्तर दिशा में यहाँ से सो योजन की दूरी पर जयद्रथ का पिता तप कर रहा है। तुम इसका मस्तक ऐसे काटो कि वह इसके पिता की गोद में जाकर गिरे।
कृष्ण के आदेशानुसार अर्जुन ने तीर चला दिया और जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और वह सिर सीधा जयद्रथ के पिता की गोद में जाकर गिरा। जयद्रथ का पिता चौंककर उठा तो उसकी गोद में से सिर ज़मीन पर गिर गया। सिर के ज़मीन पर गिरते ही उनके सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार जयद्रथ का वध हुआ और अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई।

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