Sansar me rehte hue bhagwan ki bhakti kaise kare

Sansar me rehte hue bhagwan ki bhakti kaise kare

संसार में रहते हुए भगवान की भक्ति कैसे करें?

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संसार में रहते हुए भगवान की भक्ति कैसे करें?

भगवान की भक्ति करना बहुत मुश्किल भी नहीं है और सरल भी नहीं है। लेकिन कभी कभी मनुष्य परेशान हो जाता है कि किस प्रकार संसार और भगवान दोनों के बीच सामंजस्य बनाया जाये। तो इसी सम्बन्ध में संतों के बीच एक छोटा सा प्रसंग मिलता है। ये प्रसंग मुझे फेसबुक से मिला है। जिसमें श्री रहीम जी और तुलसीदास जी के बीच की वार्ता को दिखाया गया है। हो सकता है ये प्रसंग अन्य जगह किन्हीं और संतों को लेकर कहा गया हो, लेकिन आप मूल में जाइये। बस उसकी जड़ को, उस बात को पकड़िए जो संत हमें बताना चाह रहे है।

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कहते हैं कि एक बार रहीम जी के मन में आया… जिज्ञासा हुई कि कोई व्यक्ति गृहस्थी के जंजाल में फंसे रहकर भी भगवद्भक्ति कैसे कर सकता है?

आप सभी जानते हैं एक गृहस्थी को कितनी मुश्किल होती है, अपने बच्चों का पेट भी पालना होता है, परिवार को भी देखना होता है।

तो रहीम जी सोच रहे हैं क्या ये सब संभव है? इसका हल कैसे मिल सकता है? कौन मुझे बता सकता है? क्योंकि गृहस्थी और प्रभु भक्ति, ये दोनों तो एक दूसरे के बिल्कुल उल्ट है।एक सांसारिक है.. लौकिक है औऱ दूसरी अलौकिक। दोनों का एक साथ निर्वाह कैसे संभव है ? ये तो ठीक ऐसे है जैसे दो घोड़ों पर सवार होना। मन में सोच रहे हैं इसका जवाब तो कोई ऐसा बुद्धपुरुष ही दे सकता है जिन्होंने गृहस्थ में रहते हुए भगवान को पाया हो।
ऐसा सोचकर उन्होंने श्री तुलसीदास जी एक पत्र लिखा। श्री तुलसीदास जी उस समय चित्रकूट में थे। रहीम जी उस पत्र में एक दोहा लिखते हैं कि

चलन चहत संसार की मिलन चहत करतार। दो घोड़े की सवारी कैसे निभे सवार!!
अर्थ: सांसारिक चलन में चलकर भी उस करतार(प्रभु) से मिलने का प्रयास करना दो घोड़ों की सवारी नही है? ये कैसे निभ सकता है?

हरकारा रहीम जी का यह संदेश लेकर आगरा से चला और चित्रकूट पहुँचकर गोस्वामी जी के.चरणों मे प्रणाम कर उन्हें रहीम जी का ये दोहा.. ये प्रश्न गोस्वामी तुलसीदास जी के सामने रखा।

तुलसीदास ने पहले तो अपने परममित्र के पत्र को सम्मान पूर्वक सिर से लगाया और आँखों में प्रेमाश्रु आ गए। फिर श्री तुलसीदास जी इसका उसका उत्तर लिखते हैं कि दो घोड़े की सवारी, बिल्कुल भी नहीं निभ सकता है लेकिन-

चलन चहत संसार की हरि पर राखो टेक। तुलसी यूं निभ जाएंगे दो घोड़े रथ एक॥
तुलसीदास जी कहते हैं संसारिक कर्मों को करते हुए दृष्टि प्रभु पर ही रहनी चाहिए। संसार के कर्म तो करो पर ह्रदय में हरि को बसा लो। इस तरह से ही दो घोड़े एक रथ में निभ सकते हैं। अगर तुम अलग अलग घोड़ों पर सवारी करोगे तो गिर जाओगे लेकिन उन दोनों घोड़ों को एक रथ में जोड़ लोगे तो पार हो जाओगे।

जब रहीम जी ने श्रीतुलसीदास जी का ये उत्तर पढ़ा तो गदगद हो गए और जान गए असली रहस्य कि संसार में रहते हुए भी भगवान की भक्ति की जा सकती है।

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