Complete Shrimad Bhagavad Gita in hindi

Bhagwan Kya Chahte hai?

Bhagwan(God) Kya Chahte hai?

भगवान क्या चाहते हैं?

भगवान क्या चाहते हैं? हम सभी ये सोचते हैं कि हम भगवान को क्या दे सकते हैं और भगवान क्या चाहते हैं? श्रीमद भगवद गीता में भी अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से यही प्रश्न किया है-

अर्जुन पूछते हैं कि हे मधुसूदन! तुम कहते हो कि मनुष्य अपनी अंतिम सास तक भी माया-मोह में पड़ा रहता है तो इसी कारण जन्म के चक्कर में फंस जाता है। परन्तु तुम्ही ने इस मायामय सृष्टि की रचना करके और दूसरी और मनुष्य को चंचल मन प्रदान करके, दोनों को एक दूसरे में उलझा दिया है। पग-पग पर मनुष्य के बहकने के लिए अनगिनित आकर्षण पैदा किये हैं। मनुष्य इसके जाल में उलझा रहता है, पर क्षमा करना, तुमने जाल बिछाकर किसी शिकारी या बहेलिये की भांति जाल में फंसे मनुष्य के हाथ-पैर मारने, उसके छटपटाने का तमाशा देखते रहते हो!

कृष्ण कहते हैं – मैं तमाशा नहीं देखता, बल्कि अपनी माया की लीला देखता हूँ।
अर्जुन कहता है – फिर भी केवल निहारते ही रहते हो ना! सहायता तो नहीं करते कि बेचारा प्राणी इधर-उधर भटक रहा है। रास्ता भूल पड़ा है। तुम्हारे मन में बिचारे मनुष्य की सहायता करने का विचार कभी नहीं आता कि आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लूँ! उसे सच्चा रास्ता दिखाऊँ?

श्री कृष्ण कहते हैं – बिल्कुल आता है और मनुष्य की सहायता भी करता हूँ।
अर्जुन पूछता है – परन्तु कब? कब करते हो तुम उसकी सहायता? मैं तो देख रहा हूँ, तुमने कर्म का विधान बना दिया है। जन्म-मृत्यु का चक्र चला दिया है और इस चक्र में मनुष्य को फंसा दिया है। ये तो कोई बात नहीं हुई, ये तो कोई सहायता नहीं हुई।

कृष्ण कहते हैं – मैं सहायता अवश्य करता हूँ, अपने भक्त को मैं कभी बेसहारा नहीं छोड़ता। परन्तु मनुष्य मेरी ओर देखे सहायता के लिए, मेरी ओर बढे तो मैं उसकी सहायता करूँ ना!

परन्तु वो मेरी और बढ़ने की बजाय अपने अहंकार में डूबा रहता है। अपने बाहुबल के घमंड में पड़ा रहता है। वो तो इस भ्रम में पड़ा रहता है कि संसार में उससे बढ़कर कोई नहीं है। वो तो केवल अपनी बुद्धि और अपने बल पर ही भरोसा करता है। अपने बाहुबल पर उसे अपने परमात्मा से भी अधिक विश्वास होता है।

 

अर्जुन कहता है – अपने रास्ते से भटके हुए मनुष्य की सहायता के लिए आखिर तुम उससे क्या चाहते हो? या तुम्हें सोने चाँदी के चढ़ावे चाहिए? क्या तुम्हें भक्तों से स्वादिष्ट और पांच पकवान चाहते हो?
कृष्ण बताते हैं – मैं मनुष्य से एक श्रद्धा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, कुछ नहीं मांगता। वो मेरे प्रति बड़े-बड़े चढ़ावे न चढ़ाये। सोना-चाँदी, घी, चन्दन और पकवान के चढ़ावे मुझे नहीं चाहिए। श्रद्धा और भक्ति भाव से एक फल, एक फूल, फूल की एक पत्ती, जल का एक कतरा, एक चावल का आधा दाना ही सही, मैं उसको भी भक्त की श्रद्धा से कहीं अधिक श्रद्धा से स्वीकार कर लेता हूँ।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।
अर्थ:- जो भक्त पत्र? पुष्प? फल? जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है? उस मेरे में तल्लीन हुए अन्तःकरण वाले भक्त के द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार(भेंट) को मैं खा लेता हूँ।

अरे इतना भी ना हो सके तो श्रद्धा और भक्ति का एक आंसू ही सही, मैं उसे भी कुबूल कर लेता हूँ। श्रद्धा में डूबे उस एक आंसू में मेरा सारा अस्तित्व सराबोर हो जाता है। भक्ति अथवा पश्चाताप का ये आंसू चाहे लाखों पाप करने के बाद, अंतिम शरण में क्यों ना बहाया गया हो, मैं उस अनुपम भेंट को भी स्वीकार कर लेता हूँ और मनुष्य के सब पापों को उस आंसू से धोकर उसे नवजात शिशु की तरह निष्पाप कर देता हूँ, उसका कल्याण करता हूँ, उसे मुक्ति देता हूँ।

अर्जुन पूछता है – केवल एक फल, फूल या पत्ती को अर्पण करने पर ही मुक्ति दे देते हो? फिर कर्म, विकर्म, पाप-पुण्य, धर्म-विधान सब यूं ही रह जाते हैं?
कृष्ण कहते हैं – ये धर्म, ये विधान और उसके सारे सिद्धांत तो चन्द्रमा और अनगिनत तारों की भांति होते हैं। जो अधर्म और अज्ञान के अंधकार में झिलमिलाते रहते हैं। परन्तु जब भक्ति का सूर्य उदय होता है तो ये सब के सब छुप जाते हैं।

जब तक रैन पर अहम् का पर्दा, तब तक मैं देता न दिखाई,
जिसके मन से मैं नहीं निकली, उसने मेरी कृपा नहीं पाई।
मुझे समर्पण के भाव प्यारे, उसे मिलूं जो मन से पुकारे,
हे नाथ नारायण वासुदेव।

अर्जुन पूछता है – अर्थात भक्ति का साथ इतना ऊँचा है कि धर्म भी उसके सामने तुच्छ हो जाता है?

कृष्ण कहते हैं – हाँ! परन्तु आशक्ति से रहित भक्ति जिसके लिए किसी पंडित प्रवचन, किसी पूजा सामग्री की कोई आवश्यकता नहीं, हाँ! केवल एक शर्त है।

अर्जुन पूछते हैं – वो शर्त क्या है मधुसूदन!
कृष्ण बताते हैं – पूर्ण श्रद्धा और पूर्ण भक्ति से अपने आप को, अपने सारे कर्मों को मेरे प्रति समर्पित कर दो। बस मैं अपने ऐसे भक्त को सब कुछ भुलाकर मुक्ति दे देता हूँ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।
अर्थ :- सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर ।।

कृष्ण बताते हैं – अर्जुन! भक्ति का स्थान इतना ऊँचा है कि अपने सच्चे भक्तों की मैं स्वयं भक्ति करता हूँ।

अर्जुन पूछते हैं – ये क्या कह रहे हो मधुसूदन! भला परमात्मा होकर तुम किसी भक्त की भक्ति कैसे कर सकते हो? यदि परमात्मा भी भक्त हो गया तो दोनों में क्या अंतर रह जायेगा?

कृष्ण कहते हैं – यही अंतर तो मिटाना चाहता हूँ मैं। भक्ति, भक्त और भगवान के बीच कोई सीमा रेखा नहीं खींचती। भक्ति को भगवान और भक्त के बीच एक पवित्र रिश्ता है जैसे प्रेम, किसी प्रेमिका और उसके प्रेमी को एक बंधन में बांधकर एक कर देता है। उसी प्रकार भक्ति के द्वारा भक्त अपने भगवान में तथा भगवान अपने भक्त में समां जाते हैं। दोनों एक रूप हो जाते हैं।

 

 

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