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Upanishad Story : Uddalaka Katha By Morari Bapu in hindi

Upanishad Story : Uddalaka Katha By Morari Bapu in hindi

उपनिषद कहानी : उद्दालक की कथा मोरारी बापू द्वारा

उपनिषद में पांचाल देश का सम्राट जयविल …उसके पास उद्दालक ऋषि का बेटा श्वेतकेतु जाता है और पंचाग्नि विद्या की मांग करता है ..जिज्ञासा करता है कि मुझे पंचाग्नि की विद्या बताओ। ये बहुत महिमावंत विद्या मानी गयी है।
तब पांचाल नरेश 5 प्रश्न पूछते हैं। श्वेतकतु मैं तुझे पंचाग्नि का दान दूँ इससे पहले बेटे तू 5 प्रश्नों का उत्तर दे ..

1. मरने के बाद आदमी कहाँ जाता है …तुझे पता है ?

2. मरने के बाद फिर जीव कैसे आता है ..पुनरपि जन्नमं …

3. इतने लोग मरते हैं तो पितृलोक भर क्यूँ नहीं जाता ? वहाँ कितनी जगह है ? मरते तो इतने हैं तो वहाँ housefull का board क्यूँ नहीं लगता ?

4. देव्यान मार्ग और पितृयान मार्ग कहाँ से बिलग होते हैं ?

5. कितनी आहुती के बाद जल रूप आहूत द्रव्य पुरूष के रूप में प्रगट होता है ?

ये 5 प्रश्न बहुत महत्त्व के हैं ..और मुझे जवाब खोजने हैं मानस से। ..उपनिषद ने जवाब ज़रूर दिये हैं लेकिन क्लिष्ट हैं ..जटिल हैं ..मैने बहुत उसके बारे में सोचा है ..मुझे भी समझने में कठिन पड़ रहा है ..आप तो शायद समझ भी जायें…
इसका जवाब अब मानस से सुनियेगा ….

 

1. एक ऐसी जगह है जहाँ जाने के बाद लौटना नहीं पड़ता और वो अग्नि है ..तजि जोग पावक देहि भयी …शबरी कहाँ गयी ? योग अग्नि में गयी और वहाँ जाकर रही कि जहाँ से फिर लौटना ना पड़े। ..प्रश्न उपनिषद का ..जवाब मानस का …उसको अपनी शास्त्रीय भाषा में बोलें तो …..यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम..जहाँ से कभी लौटना ना पड़े …वो ..वो जगह है जहाँ मरने के बाद चेतना निवास करती है ..वहाँ तो बहुत बड़ी list है ..मत्था घूम जाये …तुम घूमने आये हो और तुम्हारे दिमाग कहाँ घुमाऊँ ..और मानस से यदि जवाब मिल जाये तो ग्रंथों में खोजने की ज़रूरत नहीं।

मानस का अर्थ है ह्रदय और आखिरी प्रमाण माना जाता है। अंत:करण प्रवृतयाह और मैने तो केदार की कथा से कहना शुरू किया है कि अंत: करण भी प्रमाण नहीं …भजन प्रमाण …कोई पूछे किस शास्त्र में लिखा है ? खबर नहीं ..लिखा हो ..ना लिखा हो ..राम भजन प्रमाण है। तुझे मानना हो तो मान काका …वरना चलते बनो ..तो जीव कहाँ रहता है उसका प्रमाण यहाँ लिखा है। ..एक अग्नि ऐसी है योगाग्नि जहाँ जाने के बाद ..उस अग्नि विद्या से गुजरने के बाद जीव को आना नहीं पड़ता ..शबरी की ऐसी गति बतायी …

 

2. जीव वापिस कैसे आता है? …उसका अग्नि है मानस में ..यज्ञ अग्नि …

भगति सहित मुनि आहुती दिन्हे प्रगटे अगिनी चरू कर लिन्हे
श्रृगी ऋषि बसिष्ट बुलावा पुत्रकाम सुभ जग्य करावा
भये प्रगट कृपाला दीनदयाला …

कैसे आता है ? पुत्रकामेष्टी यज्ञ से आता है ..जीव ऐसे आता है। ..ये तो परमात्मा है ..मानव रूप लेकर आये …एक समान्य जीव की तरह भगवान आये ..यज्ञ की विधा है दूसरी विधि लाने की।

 

3. वहाँ सब pack क्यूँ नहीं हो जाता?

इतने लोग जाते हैं ..रहते कहाँ होंगे इतनी जगह में? जगह नहीं है ..सीमित है वहाँ …yes …तो इतने लोग कहाँ रहते हैं ? भगवान इनमें से चुनते हैं कि ऐसी चेतनाओं की जगत में ज़रूरत है। ..इसलिये कबहुंक करि करूणा नर देहि देत राम ..बिनु हेतु सनेही ..कर्म का तो इनका हिसाब पूरा हो गया है ..अब तो बस लौटना ही नहीं है ..तीसरा जवाब है। ..वो कईयों को भेजता रहता है ..भेजता रहता है …वरना तो भीड़ हो जाये …ऐसे सतपुरूषों को भेजता है जो मोक्षवादी नहीं हैं ..बार बार ऐसे भेजते हैं कि जगह खाली रहे।

 

4. देवियान मार्ग का 1 अर्थ है ज्ञान मार्ग जो थोड़ा ऊँचा मार्ग है ..धरती पर चलने की बात नहीं है ..पितृयान मार्ग है भक्ति मार्ग …बिल्कुल समझ लीजिये। हम दोनों जगह मातृ और पितृ शब्द का ही प्रयोग करते हैं ..पितृ भक्ति ..मातृ भक्ति ..हमारे से जो श्रेष्ठ हैं उनके लिये भक्ति शब्द लाया गया ..तुलसी कहते हैं बिलग नहीं होते ..बिलग दिखते हैं ….भगतिहि ग्यानहि नहि कुछ भेदा …समांतर है ..ज्ञान और भक्ति दोनों समांतर जा रहे हैं ..बीच में भेद नहीं है ..थोड़ा अंतर है ..अब train चलती है track पर.. अब जो दाहिनी ओर के पहिये पीछे रह जायें और बायीं ओर वाले पहिये आगे चले जायें ..नहीं …समांतर गति होती है …तुलसी कहते हैं भेद है ही नहीं ..लेकिन दोनों मार्ग चलने से जो station आता है ..वो 1 है।

 

5. उसको योशाग्नि कहा है जिस्से पुरूष प्रगट होता है ..आप पढ़ लेना मुझे तुलसी मर्यादा है। ..ये पूरी 1 प्रक्रिया है या उसको पुन: पुत्र कामेष्टी कह दो ..काम शब्द तो जोड दिया ना तुलसी ने …लेकिन ये काम शुभ है ..अशुभ नहीं और वहाँ आहुती की संख्या बतायी है 5 आहुती ..उसीमें से परम पुरूष प्रगट होता है।

बापू के शब्द
मानस पंचाग्नि
जय सियाराम

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