Morari Bapu all Quotes Thoughts in hindi

how to leave the material world in hindi

how to leave the material world in hindi 

Sansar ko kaise chode?

संसार को कैसे छोड़ें?

जब किसी को भी थोड़ा सा भी वैराग्य होता है तब मन करता है कि बस अब इस दुनिया में नहीं रहना है। सब नश्वर है। एक दिन तो सब खत्म हो ही जायेगा। पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि इसे श्मशान वैराग्य कहते हैं। थोड़ा ध्यान दें, जब किसी की मृत्यु होती है तब सभी कहते हैं, क्या रखा है इस संसार में? इसे छोड़ देना चाहिए। एक दिन को सबको छोड़कर जाना ही चाहिए। उनकी बातें कोई सुन ले तो लगेगा कि ये व्यक्ति अब घर ना जाकर पक्का हिमालय में जाकर सन्यास ले लेगा। लेकिन अंतिम संस्कार हो भी नहीं पाता इससे पहली ही वो कहता है, मुझे ऑफिस जाना है। मैं लेट हो रहा हूँ। मुझे ये काम है। अरे भैया! कहाँ गया अब तेरा वैराग्य। कहना सरल है। मोरारी बाबू की राम कथा मानस पंचाग्नी में एक श्रोता ने ऐसा ही प्रश्न किया है। यहाँ पर कोशिश की गई है लिखने वाले द्वारा कि एकदम वैसा ही लिखा जाये जैसा बापू बोलते हैं। मेरा विश्वास है आप ध्यान से पढियेगा आपको लगेगा कि बापू ही बोल रहे हैं–

Sansar Chod du ? संसार छोड़ दूँ?

(Morari Bapu)मोरारी बापू कथा में कह रहे हैं —

आज 1 युवान श्रोता का प्रश्न है ..बापू मैं आपका 1 युवक flower हूँ ..मैने chemical line में degree प्राप्त की। कुछ कथा मैं t.v पर सुन चुका हूँ। ..यहाँ मैं प्रत्यक्ष कथा सुन रहा हूँ। कथा सुनते सुनते मुझे अध्यात्मिक पीड़ा हो रही है और इच्छा होती है कि संसार छोड दूँ

बापू बोले- भाव तो अच्छा है। पहली बात बाप …अध्यात्म पीड़ा नहीं है। मूल में आप चूक कर रहे हो। ऐसा मैं नहीं कहूँगा ..मैं आपसे दिल की बात कहूँ ..मैं विनोद ज़रूर करूँ लेकिन मुझे जगत में किसी की भूल नहीं दिखती है ..ये मेरी कमजोरी है।

…दिखती हैं तो कुछ मेरी खुद की भूलें ज़रूर दिखती हैं। इसलिये मेरे पास आनेवाले ..दूर ..निकट ..मिल सकें ..ना सकें ..वो कभी भी ये ना सोचें कि कोई भूल हो जायेगी ..बापू नाराज हो जायेंगे ..ये मैं दिमाग में से बिल्कुल निकाल देना चाहता हूँ ..आप कभी भी निश्चिंत ..ऐसा सोचियेगा ही मत ..भूल कैसी यार ?

मैं समझाने के लिये आपसे कहूँ कि प्रश्न में आप मूल चूके हैं …ये आपकी भूल नहीं निकाल रहा हूँ ..लेकिन पूछा है तो जवाब देता हूँ कि अध्यात्म पीड़ा नहीं है। …यद्यपि आदिभौतिक ..आधि दैविक ..और अध्यात्मिक तीनों को ताप कहा है ..लेकिन अध्यात्म मूल में ताप है ..लेकिन हमारे पास आते आते शीतल हो जाता है।

जैसे सूर्य मूल में ताप है लेकिन via चंद्र आता है तो शीतल हो जाता है ..अध्यात्म ताप है अगर direct लो तो ….कोई चंद्रमा जैसा शीतल बुद्धपुरूष through लो तो ठंडक है ..via लेना पड़ेगा …नहीं पचेगा यारों ..इसलिये किसी बुद्धपुरूष की शरण में जाना पड़ता है ..कोई पहुँचे हुए फकीर के पास चुप चाप बैठना पड़ता है …गुरू द्वारा आयी अध्यात्मिक पीड़ा परम स्वास्थ्य है। 

 

..तो अध्यात्म पीड़ा है ..ये आपकी भूल है ऐसा मैं नहीं कहूँ बाप …अध्यात्म पीड़ा नहीं है …पीड़ा तो प्रेम है …जो सयाने हैं ..जिन्होने जाना है उसको अध्यात्म पीड़ा नहीं लगी ..प्रेम पीड़ा है ..हमें प्रेम दर्द है ..प्रेम महापीड़ा है ..और कभी कभी 1 ऐसी पीड़ा होती है कि पीड़ा ही स्वास्थ्य बन जाती है ..पीड़ा का अतिरेक तन्दुरुस्ती में convert हो जाता है ..पीड़ा तो व्रजवासियों ने पायी ..कहाँ अध्यात्म था व्रजवासियों के पास ? वो मुस्कुराता हुआ आया ..अध्यात्मवादी उद्धव ..बड़ा सजधजकर ..उसको क्या पीड़ा से लेना देना ? वो तो सलाह देता है …क्यूँ रोती हो ? क्यूँ भूखी रहती हो ?..छोडो ना ..लेकिन गोपी कहती है उद्धो तू तो ज्ञान की पोटली लेके आया है ..तुझे क्या पीड़ा ? …पीड़ा तो प्रेमियों को होती है।

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युवक अध्यात्म को पीड़ा मत समझ ..बाप ..गुरू पूनम का चांद ..छोटे बच्चे को माँ चाय पिलाये ना तो रकाबी (saucer )बऊ फूँके …बालक को शीतल चाय लगे तब बबेटे को देती है। गुरू हमारी माँ ।है ..मैं बार बार कहता हूँ जिसको गुरू मिल जाये उसकी माँ कभी नहीं मरती।  हमारा नया जनम गुरू गर्भ में होता है ..माँ के गर्भ में तो संसारी बालक पैदा होता है ..तन की ..मन की ..कहीं धन का अभाव हो तो धन की भी कमी खतम कर दे ऐसी माँ का नाम है गुरू।  कोई कमी ना रहने दे ..कभी कुछ कमी ना आने दे कि मेरे पास ये नहीं ..तुरंत याद आता है ..मेरा बाप है ना …मेरा गुरू है ..मेरा बुद्धपुरूष है ..लेकिन चाहिये परम निष्ठा ..गुरू और शिष्य एक दूसरे को खाते हैं। गुरू खाता है शिष्य की मूढता … और शिष्य खाता है गुरू की परम निष्ठा कि मेरे गुरू का विश्वास तो देखो …

 

युवक ने लिखा है …कथा सुननेके बाद लगता है संसार में कुछ नहीं ..छोड देना है ..

बेटा …इतनी बड़ी दुनिया क्यूँ छोडते हो ? थोडी ईर्षा छोड दो ..थोडी निंदा छोड दो ..थोड़ा द्वेष छोड दो ..
छोडना ही है ?…जो सरलता से छूटता है वोही छोड दो ना …इतनी बड़ी दुनिया को छोडने की बात करते हो ..इस जवानी में …खबरदार ..छोडना छोडना क्या ? …

गीता कहती है ..ये नित्य सन्यासी जो द्वेष छोड देता है ..

जो छोड चुके हैं वो बात और है ..भक्ति का रंग ..तुमने 2..5 कथा सुनी और तुम आवेश में आकर जगत छोडो ..तो मेरा message तुम ठीक से नहीं पकड़ रहे हो ..अग्नि परिक्षा में जियो …जगत में रहकर पंचधुणी तापो ..और जानकी की तरह

कनक पंकज कली की तरह बाहर निकलो …

तेरा स्वार्थ छोड ..तेरी ईर्षा छोड ..ये छोटा छोटा छोड ना ..बड़ा छोडनेकी क्या ज़रूरत है ?…

 

कथा सुनकर कोई ऐसा बोले तो मुझे अच्छा ना लगे
बापू के शब्द
मानस पंचाग्नि
जय सियाराम

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