Bhagwan(Ishwar) aur Insaan ka Sambandh Kaisa hai?

Bhagwan(Ishwar) aur Insaan ka Sambandh Kaisa hai?

भगवान(ईश्वर) और इंसान का सम्बन्ध कैसा है?

 

भगवान या ईश्वर या अल्लाह(Bhagwan ya Ishwar ya Allah) जो भी कहो एक ही बात है। भारत देश में जन्म लिया हो ना आपने तो गर्व करना चाहिए। हमारे देश में संत, मुनि, महात्मा और खुद भगवान ने जन्म लिया है और देवता भी तरसते रहते है। वो अलग बात है हम इसकी कीमत नहीं समझ पाते।

आइये हम समझते है भगवान और इंसान का सम्बन्ध कैसा है?

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एक संत थे। उनके पास पारस मणि थी। एक व्यक्ति को इस बात का पता चला और वो पारसमणि लेने के लिए खोजता-खोजता संत की कुटिया के पास गया।

उसने संत जी को प्रणाम किया और कहा – संत जी, मैंने सुना है कि आपके पास पारस मणि है?

सन्त ने कहा – हाँ, मेरे पास पारसमणि है।

इंसान – तो क्या आप मुझे वो पारसमणि दे सकते हैं?

संत जी कहते हैं हाँ, आप पारसमणि ले जाओ। क्योंकि वैसे भी यह हमारे किसी काम की नहीं। अब वो व्यक्ति प्रसन्न हो उठा।

सन्त ने कहा कि जाओ, कुटिया के छ्प्पर पर एक लोहे की संदूकची है, उसे ले आओ। व्यक्ति को कुछ आश्चर्य हुआ परन्तु छप्पर पर चढ़कर वह छोटी सी संदूकची उठा लाया।

क्या इसमें पारसमणि है? क्या यह पारसमणि असली है? यदि असली है तो संदूकची सोने की क्यों न हुई? उसके मन में उद्वेग चल रहा था।

जब काफी देर हो गई और ना रहा गया तो उन्होंने सन्त से पूछ ही लिया कि संदूकची में पारसमणि होने पर भी यह सोने की क्यों न हुयी?
संत जी चुप रहे और संत ने उसके सामने ही संदूकची को खोला। पारसमणि एक कपड़े के टुकड़े में लिपटी हुयी रखी थी। कपडे में, आवरण में, होने के कारण ही लोहे की संदूकची सोने की न हुयी। देखने में तो दोनों एक साथ थे लेकिन उस कपड़े के कारण एक-दुसरे का स्पर्श न हो सका और स्पर्श न होने के कारण दोनों का स्वरुप भी अलग-अलग ही बना रहा।

हमें भगवान क्यों नहीं दिखाई देते? Hamey Bhagwan dikhai kyo nahi dete ?

संत जी इस माध्यम से समझाना चाह रहे थे कि बेटा, ठीक इसी प्रकार ईश्वर और जीव दोनों ही ह्रदय में एक ही साथ रहते हैं परन्तु दोनों के बीच वासना का परदा होने के कारण दोनों का मिलन नहीं हो पाता।

जीवात्मा लोहे की संदूकची है और ईश्वर पारसमणि। जब तक जीव का अहं और ममतारुपी चिथड़ा, कपडा, न हटे तब तक ईश्वर से संपर्क कैसे हो?

श्रीहरि से प्रेम करना है, मिलना है तो विषयों का प्रेम छोड़ना ही होगा। जो अत्यधिक निकट है, उसे न देख, कहाँ खोज रहे हो ? जहाँ हो, वहीं बैठ जाओ, भटकाव का समय नहीं है; बहुत समय व्यर्थ ही व्यतीत हो गया। न जाने अब कितनी श्वाँसें शेष हैं? अगला ही क्षण कहीं अंतिम न हो। प्रियतम तो प्रेम भरी दृष्टी से निहार ही रहे है कि कब यह मेरी ओर देखे और हम संसार के दृश्यों में आनन्द लेते हुए प्रियतम को खोज रहे हैं।

परमात्मा खोजने से नहीं मिलेंगे, वो तो उनके प्रेम में खो जाने से मिलेंगे।

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