radha krishna rup

Radha Krishna Prem Katha/Leela

Radha Krishna Prem Katha/Leela

राधा और कृष्ण की प्रेम कथा/लीला 

 

राधा कृष्ण की प्रेम कथा/लीला(Radha krishna ki prem katha/Leela) से हम सभी परिचित हैं। राधा और कृष्ण प्रेम है। प्रेम रूप है, प्रेम स्वरूप है। सभी से निवेदन है यदि आप इसे संसार का प्रेम समझकर पढोगे या पढ़ना चाहोगे तो बेसक से आप मत पढ़िए। समझ में नहीं आएगा। राधा और कृष्ण दोनों को एक जानकार पढोगे तो आप इस आनंदमयी, रसभरी लीला का आनंद ले पाओगे और आप भगवान को रोते-रोते पुकार बैठोगे हाँ राधे! हाँ कृष्ण।

आज कृष्ण राधा से मिलने नहीं आये। कान्हा ने वादा किया था मेरी राधा रानी मैं तुमसे मिलने रोज आऊँगा। बस उसी बात को मन में लिए राधा रानी आज कृष्ण का बड़ी बेताबी से इंतजार रही हैं। और जब काफी देर हो गई है तो अब व्याकुल होने लगी हैं। अब श्री कृष्ण का इंतजार सहन नहीं हो रहा है राधा रानी से।
श्री किशोरी जी बार-बार एक सखी से कहती है- तुम जाकर देखो तो, कहीं वो आ तो नहीं गए?
राधा रानी की सखी बार-बार जाकर देखती है और कहती है, अभी नहीं आये, आते ही होंगे।

 

लेकिन प्रेम है, अधीर हो रही हैं राधे और सोच रही है- क्या बात है आज आ क्यों नहीं रहे हैं कान्हा? क्या किसी बात का वो मान कर रूठ गए हैं। क्या किसी सखी ने उनसे हंसी की है? किसी ने उनसे फिर से नृत्य तो नहीं करवा लिया थोड़े से माखन के लिए। राधा जी को सभी बातें, वो सभी कृष्णा के साथ बिताये हुए पल याद आ रहे हैं। ऐसा सोचते सोचते ह्रदय व्याकुल हो रहा है, आँखों में थोड़े-थोड़े प्रेमाश्रु बह रहे हैं। अब कहे भी तो किससे कहे?

जैसे तैसे सखी किशोरजी को सहमी आवाज में कहती है- हे लाड़ली, हे राधा! कान्हा अभी आते ही होंगे? तुम चिंता न करो। तनिक धैर्य धारण करो। क्या पता कुछ जरुरी काम आ गया हो उनको, कोई आवश्यक कार्य जिसे वो टाल न पाए हो।

सखी ने खूब अपनी ओर से कोशिश की है राधा रानी को धैर्य बंधाने की, खूब समझाया है। खूब तर्क दिया है।

लेकिन प्रेम कोई तर्क सुनना नहीं चाहता। वो तो केवल और केवल अपने प्रियतम को चाहता है। साथ हो तो संयोग, दूर हो तो वियोग। दोनों में आनंद है। अब राधा रानी की आँखें आंसुओं से भर गई है मानो आसूं अभी गिरने ही वाले हो। राधा रानी सखी की बात सुनकर एकदम चुप रहती है और मौन धारण किये आँखों में आंसू लिए चुपचाप इंतजार में बैठी रहती है।
सखी समझ जाती है कि प्यारी राधा रानी को सिर्फ कृष्ण चाहिए। उनकी बातें भी वो अभी सुनना नहीं चाहती है। सखी राधा जी के पास ही बैठी रहती है। राधा धीमे से एक दूसरी सखी से कहती है – तुम द्वारे पर जाकर खड़ी हो जाओ और अब कान्हा आये तो उन्हें अंदर ना आने देना, दरवाजे से ही लौटा देना, भीतर मत आने देना।

दूसरी सखी द्वारे पर जाकर खड़ी हो जाती है।

राधा रानी का भाव विलक्षण रूप ले रहा है अब। जो सखी राधा रानी के पास बैठी थी, उस सखी में राधा जी को ही कान्हा जी दिखने लगते है।

राधा रानी अपना हक़ जताकर पूछती हैं ओ कान्हा ! तुम इतनी देर कहाँ थे। बहुत देर लगा दी आने में। तुम जानते हो मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाती हूँ, फिर भी तड़पाते हो। लेकिन याद रखना एक दिन मेरे प्राण निकल जायेंगे फिर किससे मिलने आओगे? क्यों इतना सताते हो? क्यों परेशान करते हो? क्यों परीक्षा लेते हो?

राधा जी ऐसा कहते-कहते उस सखी का बार-बार आलिंगन करने लगती हैँ। वो सखी भी एकदम चुप रहती है। समझती है अगर मैं राधा जी को रुकूंगी तो कहीं इनके प्राण न निकल जाएँ। अभी यूँ ही रहने देती हूँ। कम से कम इन्हे व्याकुलता तो नहीं हो रही है। फिर सोचती है यदि आज सच्ची में कान्हा नहीं आये तो कितनी देर ये व्याकुलता रहेगी?

सखी भी श्यामा जू के आनन्द में ही आनन्दित हो रही है।

श्यामा जू कहती है श्यामजी तुम थोड़ा जल्दी लौट आया करो। इतना न सताया करो।

ये सब सखी के साथ हुआ तो सखी की दशा भी विचित्र हुए जा रही है। कुछ बोल पा नहीं रही है। बस.. आनंद में है।

इधर सखी की दशा भी विचित्र होती जा रही है और उधर से श्यामसुन्दर कृष्ण कन्हैया, बंसी बजईया मंद-मंद मुस्कुराते हुए अंदर आ रहे हैं।

द्वार पर खड़ी सखी कान्हा को रोकते हुए कहती है नहीं, नहीं… आप लौट जाइये, आपको भीतर जाने की आज्ञा नहीं है। श्यामा जो ने अंदर आने से मना किया है।

कृष्ण – क्यों, मैंने क्या किया है ?

सखी – आज श्री जी.. आपके विलम्ब के कारण बहुत पीड़ा में हैँ वो आपसे रूठ गयी हैं और मुझसे कहा है कि कान्हा आये तो उन्हें द्वार से लौटा देना।

यहाँ अब कृष्ण भी व्याकुल हो रहे हैं – मुझे भीतर जाने दो मुझे मिलना है राधा रानी से।

सखी कहती है- नहीं नहीं.. कदाचित नहीं.. स्वामिनी जू की आज्ञा नहीं है। आप भीतर नहीं जा सकते।
कान्हा उस सखी की बहुत मनुहार करते हैँ। उनके सामने बहुत प्रार्थना करते हैं। हाथ तक जोड़ लेते हैं और आँखों में आंसू भरकर कहते हैं, मैं वापिस नहीं लौट पाऊँगा।

अब सखी को कान्हा की स्थिति पर दया आने लगती है। आखिर कान्हा तो मेरी स्वामिनी श्री राधा जी के प्राणवल्लभ हैं। राधा जू तो इनसे कभी रूठ ही नहीं सकती । उनका मान भी क्षण भर का होता है। सखी को स्वामिनीजू के हृदय की स्थिति ज्ञात है।

सखी कहती है अच्छा ठीक है, आप बाहर ही रुको, मैं भीतर जाकर राधे जू से आज्ञा लेकर आती हूँ।

सखी भीतर की ओर जाती है तो क्या देखती है, राधा जी तो एक सखी को श्यामसुन्दर ही समझ बैठी हैं।
उसका कर अपने करों में लेकर नैन मूँद कर बैठी हुई है।

वो सखी इशारो से उस सखी को कहती है कि कान्हा आये हैं। सखी कहती है उन्हें शीघ्रः भीतर भेज दो।

सखी पुनः बाहर जाकर कान्हाजी को भीतर भेज देती हैँ।

भीतर बैठी सखी कान्हाजी को इशारा करती है।
अब कान्हा उस सखी की जगह आकर खुद बैठ जाते हैं और श्री राधा का कर अपने कर में ले लेते हैँ और सखी चली जाती है।

जैसे ही श्यामसुन्दर का कर श्री जू के कर से स्पर्श करता है श्री प्रिया जू धीरे से अपने मूँदे हुए नैन खोलती हैं और श्यामसुन्दर को अपने समक्ष देखती हैं।
उनके लिए तो श्यामसुन्दर पहले से ही मौजूद थे।
श्यामा उन्हें पुनः आलिंगन में ले लेती हैं और सखियाँ युगल के आनन्द से आनन्दित होती हैँ।

मानो आज राधा रानी कान्हा से मन ही मन कह रही है –
खूबसूरत तेरा मुस्कुराना लगे, ये मेरी आरज़ू का फ़साना लगे।
तेरा हर एक बहाना मुझे सच लगे, मेरा सच भी तुझे एक बहाना लगे।

ये प्रेम है। वाणी मौन है। आँखों में आंसू है। परमात्मा प्रेम है।

जय श्री राधे कृष्णा .. जय जय श्री राधे..जय जय श्री राधे.. जय जय श्री राधे।

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