Narada and Krishna story(katha) in hindi

Narada and Krishna story(katha) in hindi

नारद और श्री कृष्ण कथा(कहानी)

नारदजी और भगवान कृष्ण में वार्तालाप चल रही थी। भगवान श्री कृष्ण ने कहा- नारदजी! मैं आपकी भक्ति से प्रसन्न हूँ जो मांगना है मांग लीजिये। नारदजीः “प्रभु ! मैं क्या माँगू ?मुझे आपके चरणों की भक्ति का वरदान दो।”
भगवान कहते हैं भक्ति तो मैंने आपको दे ही रखी है और कुछ चाहिए तो मांग लो।
नारदजी कहते हैं- प्रभु! आप मायाधिपति कहलाते हैं। तो अपनी माया का मुझे दर्शन करवाइये?

भगवान बोलने सब माया से तरने का उपाय पूछते हैं और तुम माया के दर्शन के लिए कह रहे हो।
नारदजी ने कहा की- हाँ आपकी माया को देख लूँगा तो माया से तर जाऊँगा।

भगवान बोले की- नारदजी! ऐसा नही है की माया देखकर माया से तर जाओगे?
लेकिन नारद जी ने ज़िद्द कर ली। मुझे आपकी माया देखकर ही पार होना है।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- नारद आज मैं तुम्हारे सामने माया के रहस्य का वर्णन करूंगा। चलो महल से बाहर निकलकर तुम्हें बताता हूं।
भगवान कृष्ण और नारदजी महल से आगे चलने लगे, तभी भगवान ने नारदजी से कहा- मुनि नारद, मुझे बहुत तेज प्यास लगी है, क्या आप मेरे लिए नदी से पानी ले आएंगे।

 

नारदजी ने कहा- अवश्य प्रभु। नारदजी जल लेने के लिए नदी के समीप गए। तभी उनकी दृष्टि वहां जल भर रही एक सुंदर स्त्री पर पड़ी। नारद उसके रूप को देखकर उस पर मोहित हो गए। जब वह स्त्री जल भरकर जाने लगी तब नारदजी भी उनके पीछे चल दिए।

 

वह स्त्री गांव के एक घर में गई। नारदजी घर में जाने लगे, तभी एक वृद्ध ने उन्हें रोका और पूछा- आप कौन हैं।
नारदजी ने कहा- मैं भगवान विष्णु का परम भक्त नारद हूं।

 

नारदजी ने उस वृद्ध से पूछा- आप कौन हैं और स्त्री आपकी क्या लगती है?

वृद्ध ने कहा- यह मेरी बेटी है।

नारदजी ने कहा- क्या आप अपनी पुत्री का विवाह मुझसे करेंगे?

वृद्ध ने कहा- ठीक है।

दोनों की शादी हो गई। नारदजी खुशी से अपना जीवन व्यतीत करने लगे। समय बीतने पर उनकी संतान भी हुई। नारदजी सोचने लगे कितना खुशहाल जीवन है।

एक दिन अचानक गांव में भयंकर बाढ़ आई। सारे गाँव में पानी ही पानी भर गया। नारदजी ने सोचा कि इस गांव से बाहर निकलना ‍चाहिए। उन्होंने एक युक्ति निकाली। लकड़ी के दरवाजे पर अपने पूरे परिवार को बिठा लिया और पानी पर तैरने लगे। अचानक उनके बच्चे नदी में डूबने लगे जब उसे बचाने लगे तो पत्नी भी पानी में गिर गई और डूबने लगी।

नारदजी दुखी हो गए और रोने लगे चिल्लाने लगे… हाय मेरे बच्चे! हाय मेरी पत्नी!

तभी भगवान कृष्ण ने उनका हाथ पकड़ा और कहा- नारदजी! क्या हो गया। क्यों चिल्ला रहे हो। मैंने तुम्हे पानी लेने के लिए भेजा था। पानी लाये तुम?

नारदजी कहते हैं- आपको पानी की पड़ी है और यहाँ मेरे बीवी-बच्चे पानी में डूब गए।
तभी भगवान कृष्ण जी हँसे है और कहते हैं नारदजी यही तो मेरी माया है। माया का अर्थ है-मा का अर्थ है नही, या का अर्थ है जो।जो नहीं है वही तो मेरी माया है।

भगवान कहते हैं- माया से तरना आसान भी है और कठिन भी है। माया में रहकर माया से तरना चाहो तब कठिन है पर जब अपने-आप में ठहरते हो, तो माया से तरना आसान है।

नारदजी ने भगवान के पैर पकड़ लिए और कहते है प्रभु! मैं समझ गया क्या होती है माया!

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