Narad muni story 1 in hindi

Narad muni story 1 in hindi 

नारद  मुनि जी की कहानी 1

Narad Muni ki tapasya : नारद मुनि की तपस्या 

नारद(Narad) जी एक बार विचरण करते हुए हिमालय के निकट पहुंचे हैं। एक सुंदर गुफा देखि हैं। पर्वत, नदी और वन के (सुंदर) विभागों को देखकर नादरजी का लक्ष्मीकांत भगवान के चरणों में प्रेम हो गया। मन में आया की में भगवान का तप करूँ।

ऐसी समाधि लगी की इंद्र(indra) को चिंता हो गई। नारद जी का तप जब बढ़ा तो इंद्र घबरा गया। और इंद्र ने कामदेव(kaamdev) को नारदजी की समाधि खोलने के लिए भेजा। कामदेव ने अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गए, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवांगनाएँ, जो सब की सब कामकला में निपुण थीं वे बहुत प्रकार की तानों की तरंग के साथ गाने लगीं और हाथ में गेंद लेकर नाना प्रकार के खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने अनेक प्रकार के मायाजाल किए।

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कामदेव ने बहुत प्रयास किया लेकिन नारदजी की समाधि को नही खुलवा पाया। कामदेव ने हार मान ली और नारद जी के चरणो में गिर गए। कामदेव बोले की मैंने बड़े बड़े महात्माओं की समाधि को खुलवाया लेकिन आपकी समाधि इतनी पक्की थी की मैं तुड़वा नही सका।

कामदेव जी कहते है-नारदजी आज आपने केवल काम को नही जीता है, काम के साथ-साथ क्रोध को भी जीत लिया है। क्योंकि मैंने भोले नाथ(Bhole Nath) की समाधि खुलवाई थी, और उन्हें क्रोध भी आया था। मुझे जलाकर भस्म कर दिया था। लेकिन आपने तो मुझ पर क्रोध भी नही किया। आपने काम और क्रोध दोनों को जीत लिया है।

Narad Muni ka Abhimaan : नारद मुनि का अभिमान 

कामदेव के ये वचन नारद जी के दिमाग में आ गए। नारदजी को लगा की मैं तो शंकर जी से भी श्रेष्ठ हो गया। और अभिमान आ गया। तुरंत देवताओं के समाज में गए हैं और खूब अपना गुणगान गाया हैं। कहते फिर रहे हैं की मैंने काम को जीत लिया, मैंने क्रोध को जीत लिया।

इसके बाद तुरंत भोले नाथ के पास पहुंचे हैं। शिव(shiv) के पास गए हैं- मार चरति संकरहि सुनाए। (Maar charit shankarhi sunay)
यहाँ पर गोस्वामी तुलसीदास(Goswami Tulsidas) जी ने कामदेव को एक नाम दिया हैं मार(Maar)। पूज्य गुरुदेव कहते हैं की क्योंकि जिसके सिर पर कामदेव सवार हो जाता हैं उसे मार कर ही छोड़ता हैं।

नारद जी ने खूब अपना गुणगान गया हैं और कहते हैं मैंने इस तरह से कामदेव को हराया हैं। काम और क्रोध दोनों को जीत लिया हैं।
शिव जी को अच्छा नही लगा हैं। क्योंकि जो राम चरित्र सुनने वाले हैं उन्हें काम का चरित्र अच्छा नहीं लगेगा।

भोले नाथ बोले एक बात कहूँ नारद- जो आप ये काम कथा सुना रहे हो ना।
नारद जी बीच में ही बोल पड़े – हाँ महाराज, जरा बताओ मेरी कथा कैसी लगी?

शिव जी बोले की कथा आपने ऐसी सुनाई हैं की मैं इस बारे में केवल इतना ही कहूँगा की यहाँ तो सुना रहे हो, पर भगवान विष्णु को मत सुनाना। अगर चर्चा भी चले तो भी इसे छिपाना। भगवान शिव ने बहुत समझाया हैं पर नारद जी को ये बात अच्छी नहीं लगी हैं।

Narad Ka Vishnu ji ke pass jana : नारद का विष्णु जी के पास जाना 

विचरण करते हुए जा रहे थे और हरी का गान करते हुए विष्णु लोक पहुंचे हैं। लेकिन अभिमान से भरे हुए हैं। भगवान उठकर बड़े आनंद से उनसे मिले और ऋषि (नारदजी) के साथ आसन पर बैठ गए। भगवान कहते हैं नारदजी क्या बात हैं कई दिनों बाद दर्शन दिए आपने?

भगवान शिव ने नारद जी को मना किया था लेकिन इसके बावजूद नारदजी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान को कह सुनाया।
भगवान बोले की आप तो ब्रह्मचर्यव्रत में तत्पर और बड़े धीर बुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?

नारदजी ने अभिमान के साथ कहा- भगवन! यह सब आपकी कृपा है। करुणानिधान भगवान ने मन में विचारकर देखा कि इनके मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है। मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है। मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा, जिससे नारद जी का कल्याण और मेरा खेल हो।

तब नारदजी भगवान के चरणों में सिर नवाकर चले। उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया।

Narad ji ka bander banna : नारद जी का बंदर बनना

अब लक्ष्मीपति ने अपनी माया रचनी शुरू कर दी। एक सुंदर नगर का निर्माण किया है। जो देखने में वैकुण्ठ से भी सुंदर है। उस नगर में ऐसे सुंदर नर-नारी बसते थे, मानो बहुत से कामदेव और (उसकी स्त्री) रति ही मनुष्य शरीर धारण किए हुए हों। उस नगर में शीलनिधि(sheelnidhi) नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह (टुकड़ियाँ) थे।

इस राजा के एक कन्या है- जिका नाम है विश्वमोहिनी(vishwamohini)। ये ऐसी रूपवती है जिसे देखकर स्वयं लक्ष्मी भी मोहित हो जाये। यह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती है जिस कारण से अनेक राजकुमार यहाँ आये हुए है।

नारद जी भी उसी नगर में पहुंच गए और राजा ने मुनि को आसन पर बिठाया। (फिर) राजा ने राजकुमारी को लाकर नारदजी को दिखलाया। और कहाँ की महाराज आप इसके लक्षणों को कहिये।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गए और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गए। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आपको भी भूल गए। (लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि) जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जाएगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे।

राजा से लड़की के सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिए। अब नारद जी ये सोच रहे हैं की मैं कुछ ऐसा करूँ की ये कन्या मुझसे ही शादी करे। सोचते हैं की मैं श्री हरि के पास जाता हूँ। क्योंकि वो मुझे सुंदरता भी प्रदान कर देंगे और मेरा हित भी कर देंगे। नारद जी ने भगवन की बहुत प्रकार से विनती की हैं। और भगवान विष्णु वहीं प्रकट हो गए हैं। नारद जी ने सब बात विष्णु जी को बताई हैं।
और कहते हैं हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिए। मैं आपका दास हूँ।
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥

इस पर भगवान विष्णु कहते हैं- हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता। और भगवान ये कहकर अंतर्ध्यान हो गए हैं।

अब ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गए जहाँ स्वयंवर की भूमि बनाई गई थी। राजा लोग खूब सज-धजकर समाज सहित अपने-अपने आसन पर बैठे थे। मुनि (नारद) मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुंदर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी।

वहां शिवजी के दो गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेष बनाकर सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे।
नारदजी अपने हृदय में रूप का बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज (पंक्ति) में जाकर बैठे थे, ये शिवजी के दोनों गण भी वहीं बैठ गए। ब्राह्मण के वेष में होने के कारण उनकी इस चाल को कोई न जान सका।

अब श्री भगवान ने नारद जी का मोह दूर करने के लिए उन्हें बंदर का रूप दिया हैं। राजकन्या ने (नारदजी का) वह रूप देखा। उनका बंदर का सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्या के हृदय में क्रोध उत्पन्न हो गया।

जिस ओर नारदजी (रूप के गर्व में) फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजी के गण मुसकराते हैं।

उसी स्वयंवर में भगवान विष्णु भी जा पहुंचे। राजकुमारी ने हर्षित होकर भगवान के गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन को ले गए। सारी राजमंडली निराश हो गई।

तब शिवजी के गणों ने मुसकराकर कहा- जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिए! ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे।

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5 thoughts on “Narad muni story 1 in hindi

    • nothing is myth in the story.. apna apna vishwas hota hai….. Narad ji ek guru hai. Jise narad ji mile hai use bhagwan bhi jarur mile hai.. Jaise Dhruv or Prahlad ji .. .

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