Narad Muni Complete Story in hindi

 

वेदव्यास जी, मैं संतों की सेवा में लग गया और मुझे पत्तल फेंकते-फेंकते सुबह से शाम हो गई लेकिन किसी ने मुझे भोजन के लिए नही पूछा।  मुझे बहुत भूख लगी थी मैंने एक बरतनों में लगा हुआ संत का झूठा प्रसाद खा लिया। आपको क्या बताऊं की मेरे इस पार्षद को खाने से आत्मा तृप्त हो गई। इससे मेरे सारे पाप धुल गये। इस प्रकार उनकी सेवा करते-करते मेरा हृदय शुद्ध हो गया और वे लोग जैसा भजन-पूजन करते थे, उसी में मेरी भी रुचि हो गयी । और मुझे ऐसा करते हुए एक संत ने अपने पास बुलाया। और खाने के लिए भोजन दिया।

 

जब उनका चातुर्मास पूरा हुआ और वो जाने लगे तो उन्होंने मुझे एक मन्त्र दिया। जिसे वासुदेव गायत्री मन्त्र(Vasudev Gayatri Mantra) कहा जाता है। 

ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च॥(Om namo bhagwate tubhyam vasudevay dhimahi. Pardyumana anirudhay namh Shankar shanay ch:))

 

‘प्रभो! आप भगवान श्रीवासुदेव को नमस्कार है। हम आपका ध्यान करते हैं। प्रदुम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण को भी नमस्कार है’।

 

मैं दिन रात इस मन्त्र का जप करता और भगवान का ध्यान करता रहता था। लेकिन मेरी माँ मुझे ध्यान नही करने देती थी। जब भी मैं ध्यान में बैठ जाता था तो कभी मुझे कहती की बेटा, तेरे दोस्त तुझे खेलने के लिए बुला रहे हैं, कभी कहती दूध पी लो, कभी कहती भोजन कर लो।  उसने अपने को मेरे स्नेहपाश से जकड़ रखा था ।

 

 

एक दिन की बात है, मेरी माँ गौ दुहने के लिये रात के समय घर से बाहर निकली। रास्ते में उसके पैर से साँप छू गया, उसने उस बेचारी को डस लिया। उस साँप का क्या दोष, काल की ऐसी ही प्रेरणा थी । मैंने समझा, भक्तों का मंगल चाहने वाले भगवान का यह भी एक अनुग्रह ही है। इसके बाद मैं उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ।

 

फिर मैं एक वन में गया वहां  पीपल के नीचे आसन लगाकर मैं बैठ गया। और उन संत-महात्माओं द्वारा दिए हुए मन्त्र का जप करने लगा।     

 

भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करते ही भगवत्-प्राप्ति की उत्कट लालसा से मेरे नेत्रों में आँसू छलछला आये और हृदय में धीरे-धीरे भगवान प्रकट हो गये । फिर कुछ समय बाद  भगवान की आकाशवाणी हुई की – ‘खेद है कि इस जन्म में तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनकी वासनाएँ पूर्णतया शान्त नहीं हो गयीं हैं, उन अधकचरे योगियों को मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है। लेकिन अगले जन्म में तुम्हे मेरे दर्शन जरूर होंगे। और अब मैं भगवान की भक्ति और कृपा के कारण नारद हूँ।

 

मैं भगवान की कृपा से वैकुण्ठादि में और तीनों लोकों में बाहर और भीतर बिना रोक-टोक विचरण किया करता हूँ। मेरे जीवन का व्रत भगवद्भजन अखण्ड रूप से चलता रहता है । मुझे भगवान ने एक वीणा दी है। जिसमे मैं सिर्फ भगवान की लीलाओं का गुणगान करता हूँ। 

देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम्। मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम्॥   ((Devdattammimam veenam swarbrhamvibhushitam. Murchyitva harikatham gaaymanaschramhyam.))

 

भगवान की दी हुई इस स्वर ब्रम्ह से विभूषित वीणा पर तान छेड़कर मैं उनकी लीलाओं का गान करता हुआ सारे संसार में विचरता हूँ। जब मैं उनकी लीलाओं का गान करने लगता हूँ, तब वे प्रभु, जिनके चरणकमल समस्त तीर्थों के उद्गम स्थान हैं और जिनका यशोगान मुझे बहुत ही प्रिय लगता है, बुलाये हुए की भाँति तुरन्त मेरे हृदय में आकर दर्शन दे देते हैं ।

 

जिन लोगों का चित्त निरन्तर विषय भोगों की कामना से आतुर हो रहा है, उनके लिये भगवान की लीलाओं का कीर्तन संसार सागर से पार जाने का जहाज है, यह मेरा अपना अनुभव है ।

 

व्यासजी! आप निष्पाप हैं। आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब अपने जन्म और साधना का रहस्य तथा आपकी आत्मतुष्टि का उपाय मैंने बतला दिया । आप श्रीमद भागवत ग्रन्थ का निर्माण कीजिये। इस प्रकार नारद जी ने अपना पुर्जन्म सुनाया और व्यास जी का असंतोष दूर किया ।  फिर वेदव्यास जी ने श्रीमद भागवत पुराण का निर्माण किया। 

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