Vaibhav Laxmi Vrat Katha/Story in hindi

Vaibhav Laxmi Vrat Katha/Story in hindi

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा/कहानी

 

एक शहर था। उसमें लाखों लोग रहते थे। सभी अपने-अपने कामों में रत रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराइयाँ बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे। इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

 

ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे। सब कुछ अच्छे से बीत रहा था।

 

लेकिन समय एक जैसा नही रहता है। देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह सड़क पर आ गया। उसकी हालत एक भिकारी की तरह हो गई थी।

 

शराब, जुआ, रेस, चरस-गाँजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फँस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गँवा दिया। हर बुरी चीज की लत लग गई।

 

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँ खड़ी थी। जो वृद्ध थी।

उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था। उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस माँ को आदर के साथ घर में ले आई। लेकिन इतनी गरीबी आ गई थी की घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया।

 

माँ बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहाँ आती हूँ।’ लेकिन शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी। फिर माँ बोलीं- ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।’

 

माँ के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी।

माँ ने कहा- ‘बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता।’ माँ के व्यवहार से शीला को काफी सहारा मिला और उसने माँ को अपनी सारी कहानी बता दी।

 

कहानी सुनकर माँ ने कहा- ‘कर्म की गति महान होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। और जैसा कर्म करेगा वैसा ही इस जीव को फल मिल जाता है। इसलिए तू अब चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे।

 

तू माँ लक्ष्मीजी की भक्त है ना । माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।’

 

शीला के पूछने पर माँ ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। माँजी ने कहा- ‘बेटी! माँ लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।’

 

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि माँ कहाँ गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि माँ और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं। बोलिए लक्ष्मी मैया की जय !!

 

दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने माँजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।

 

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस(21) शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है।

 

हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को प्रणाम किया।

 

एक विशेष बात आपको माँ से जो मांगना है आप मांगिये लेकिन सबके मंगल की, सबके हित की और सबके भले की माँ से जरूर प्रार्थना कीजिये।

 

व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं। वैभवलक्ष्मी व्रत’ उद्यापन विधि सात, ग्यारह या इक्कीस, जितने भी शुक्रवारों की मन्नत माँगी हो, उतने शुक्रवार ‍तक यह व्रत पूरी श्रद्धा तथा भावना के साथ करना चाहिए। आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करना चाहिए।

बोलिए लक्ष्मी मैया की जय !!Laxmi Maiya Ki Jai!!

 

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6 thoughts on “Vaibhav Laxmi Vrat Katha/Story in hindi

  1. mai apne student hu and married v hu pr mai hostel m rehte hu .mai laxmi ji ki vrat rakhna chahte hu pr Kaise rakhu ? kya hostel mai karna thikh rheaga?

    • Vaise to laxmi ji ke vrat aap apne pati ke ghar hi kare to jayada accha hai, lekin yadi aap karna hi chahte hai or aapka man kar raha hai to aap kar sakte hai. kya Pta Maa laxmi ji chahti ho ki aap Vrat rakhe. Kyonki unki kripa ke bina koi bhi vrat nahi rakh sakta hai..Jai Mata Di..

    • Theek rhega
      Bus AGR hostel se kahin or Jana pade to mat rkhna or AGR hostel se ghr aao to rkh skate ho
      AGR kisi or k ghr jao chahe wo maayka hi kyun na ho mat rkhna wrat .. Uski wajah yeh h ki agr kisi or k ghr rkha to wrat ka fal unko milega apko nhin

      • Vaise to vrat apne ghar pr hi rakhne chahiye.. lekin agar aapko kahin baahar jana pade to(kisi jaruri karan se) to aap vahan bhi vrat rakh sakte hai. uska fal aapko hi milega.. kisi dusre ko nahi.. kyonki bhojan aap karoge to aapki hi bhuk mitegi.. padosi ki nahi.. Aap vrat kijiye.. Jai Maa Laxmi..

  2. Jai maa vaibhav Laxmi ?.meine abhi last week se vart start ki hu. lekin kuch month ke liye mujhe & mere husband ko dusere city me rahna hai please batyee ki kay me vaha ye vart continue ker saketi hu.

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