Gopi Pranaya Geet (Bhagwat Puran) in hindi and Sanskrit

Gopi Pranaya Geet (Bhagwat Puran) in hindi and Sanskrit

गोपी प्रणय गीत (श्रीमद भागवत महापुराण)

 

श्रीगोप्य ऊचुः । (गोपियाँ गाती हैं)

मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम् ।
भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान् देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून् ॥ ३१ ॥

अर्थ :  गोपियों ने कहा – प्यारे श्रीकृष्ण! तुम घट-घट व्यापी हो। हमारे हृदय की बात जानते हो। तुम्हें इस प्रकार निष्ठुरता भरे वचन नहीं कहने चाहिये। हम सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणों में ही प्रेम करती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि तुम स्वतन्त्र और हठीले हो। तुम पर हमारा कोई वश नहीं है। फिर भी तुम अपनी और से, जैसे आदि पुरुष भगवान नारायण कृपा करके अपने मुमुक्षु भक्तों से प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें स्वीकार कर लो। हमारा त्याग मत करो।।31।।

 

यत्पत्यपत्यसुहृदां अनुवृत्तिरङ्‌ग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् ।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा ॥ ३२ ॥

अर्थ :  प्यारे श्यामसुन्दर! तुम सब धर्मों का रहस्य जानते हो। तुम्हारा यह कहना कि ‘अपने पति, पुत्र और भाई-बंधुओं की सेवा करना ही स्त्रियों का स्वधर्म है’ – अक्षरशः ठीक है। परन्तु इस उपदेश के अनुसार हमें तुम्हारी ही सेवा करनी चाहिये; क्योंकि तुम्हीं सब उपदेशों के पद[2] हो; साक्षात भगवान हो। तुम्हीं समस्त शरीरधारियों के सुहृद हो, आत्मा हो और परम प्रियतम हो॥ 32 ॥

 

कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम् ।
तन्नः प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या आशां धृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ॥ ३३ ॥

अर्थ :  आत्मज्ञान में निपुण महापुरुष तुमसे ही प्रेम करते हैं, क्योंकि तुम नित्य प्रिय एवं अपने ही आत्मा हो। अनित्य एवं दुःखद पति-पुत्रादि से क्या प्रयोजन है? परमेश्वर! इसलिये हम पर प्रसन्न होओ। कृपा करो। कमलनयन! चिरकाल से तुम्हारे प्रति पाली-पोसी-आशा-अभिलाषा की लहलहाती लता का छेदन मत करो।॥ 33 ॥

 

 

चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये ।
पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा ॥ ३४ ॥

अर्थ :  मनमोहन! अब तक हमारा चित्त घर के काम-धंधों में लगता था। इसी से हमारे हाथ भी उसमें रमे हुए थे। परन्तु तुमने हमारे देखते-देखते हमारा वह चित लूट लिया। इसमें तुम्हें कोई कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ी, तुम तो सुखस्वरूप हो न! परन्तु अब तो हमारी गति-मति निराली ही हो गयी है। हमारे ये पैर तुम्हारे चरण कमलों को छोड़कर एक पग भी हटने के लिये तैयार नहीं हैं, नहीं हट रहे हैं। फिर हम व्रज में कैसे जायँ? और यदि वहाँ जायँ भी तो करें क्या?॥34 ॥

 

सिञ्चाङ्‌ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम् ।
नो चेद् वयं विरहजाग्नि उपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥ ३५ ॥

अर्थ :  प्राणवल्लभ! हमारे प्यारे सखा! तुम्हारी मन्द-मन्द मधुर मुस्कान, प्रेम भरी चितवन और मनोहर संगीत ने हमारे हृदय में तुम्हारे प्रेम और मिलन की आग धधका दी है। उसे तुम अपने अधरों की रसधार से बुझा दो। नहीं तो प्रियतम! हम सच कहतीं हैं, तुम्हारी विरह व्यथा की आग से हम अपने-अपने शरीर जला देंगी और ध्यान के द्वारा तुम्हारे चरणकमलों को प्राप्त करेंगी॥ 35 ॥

 

यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य ।
अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमङ्ग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः ॥ ३६ ॥

अर्थ :  प्यारे कमलनयन! तुम वनवासियों के प्यारे और वे भी तुमसे बहुत प्रेम करते हैं। इससे प्रायः तुम उन्हीं के पास रहते हो। यहाँ तक कि तुम्हारे जिन चरणकालों की सेवा का अवसर स्वयं लक्ष्मी जी को कभी-कभी ही मिलता है, उन्हीं चरणों का स्पर्श हमें प्राप्त हुआ। जिस दिन यह सौभाग्य हमें मिला और तुमने हमें स्वीकार करके आनन्दित दिया, उसी दिन से हम और किसी के सामने एक क्षण के लिये भी ठहरने में असमर्थ हो गयी हैं – पति-पुत्रादि को की सेवा तो दूर रही॥ 36 ॥

 

श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम् ।
यस्याः स्ववीक्षण कृतेऽन्यसुरप्रयासः तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः ॥ ३७ ॥

अर्थ :  हमारे स्वामी! जिन लक्ष्मी जी का कृपा कटाक्ष प्राप्त करने के लिये बड़े-बड़े देवता तपस्या करते रहते हैं, वही लक्ष्मी जी तुम्हारे वक्षःस्थल में बिना किसी की प्रतिद्वंद्विता के स्थान प्राप्त कर लेने पर भी अपनी सौत तुलसी के साथ तुम्हारे चरणों की रज पाने की अभिलाषा किया करती हैं। अब तक के सभी भक्तों ने उस चरणरज का सेवन किया है। उन्हीं के समान हम भी तुम्हारी उसी चरणरज की शरण में आयी हैं॥ 37 ॥

 

 

तन्नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽन्घ्रिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः ।
त्वत्सुन्दरस्मित निरीक्षणतीव्रकाम तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ॥ ३८ ॥

अर्थ :  भगवन! अब तक जिसने भी तुम्हारे चरणों की शरण की, उसके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये। अब तुम हम पर कृपा करो। हमें भी अपने प्रसाद का भाजन बनाओ। हम तुम्हारी सेवा करने की आशा-अभिलाषा से घर, गाँव, कुटुम्ब – सब कुछ छोड़कर तुम्हारे युगल चरणों की शरण में आयी हैं। प्रियतम! वहाँ तो तुम्हारी आराधना के लिये अवकाश ही नहीं है। पुरुषभूषण! पुरुषोत्तम! तुम्हारी मधुर मुस्कान और चारू चितवन ने हमारे हृदय में प्रेम की – मिलन की आकांक्षा की आग धधका दी है; हमारा रोम-रोम उससे जल रहा है। तुम हमें अपनी दासी के रूप में स्वीकार कर लो। हमें अपनी सेवा का अवसर दो॥ 38॥

 

 

वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम् ।
दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ॥ ३९ ॥

अर्थ :  प्रियतम! तुम्हारा सुन्दर मुखकमल, जिस पर घुँघराली अलकें झलक रही हैं; तुम्हारे ये कमनीय कपोल, जिन पर सुन्दर-सुन्दर कुण्डल अपना अनन्त सौन्दर्य बिखेर रहे हैं; तुम्हारे ये मधुर अधर, जिनकी सुधा सुधा को भी लजाने वाली है; तुम्हारी यह नयन मनोहारी चितवन, जो मन्द-मन्द मुस्कान से उल्लसित हो रही है; तुम्हारी ये दोनों भुजाएँ, जो शरणागतों को अभयदान देने में अत्यन्त उदार हैं और तुम्हारा यह वक्षःस्थल, जो लक्ष्मी जी का – सौन्दर्य की एकमात्र देवी का नित्य क्रीडास्थल है, देखकर हम सब तुम्हारी दासी हो गयी हैं॥ 39॥

 

 

का स्त्र्यङ्‌ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम् ।
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ॥ ४० ॥

अर्थ :  प्यारे श्यामसुन्दर! तीनों लोकों में भी और ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह-क्रम से विविध प्रकार की मूर्च्छानाओं से युक्त तुम्हारी वंशी की तान सुनकर तथा इस त्रिलोकसुन्दर मोहिनी मूर्ति को – जो अपने एक बूँद सौन्दर्य से त्रिलोकी को सौन्दर्य का दान करती है एवं जिसे देखकर गौ, पक्षी, वृक्ष और हिरन भी रोमांचित, पुलकित हो जाते हैं – अपने नेत्रों से निहारकर आर्य-मर्यादा से विचलित न हो जाय, कुल-कान और लोकलज्जा को त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय॥ 40 ॥

 

 

व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता ।
तन्नो निधेहि करपङ्‌कजमार्तबन्धो तप्तस्तनेषु च शिरःसु च किङ्‌करीणाम् ॥ ४१ ॥

अर्थ :  हमसे यह बात छिपी नहीं है कि जैसे भगवान नारायण देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम व्रजमण्डल का भय और दुःख मिटाने के लिये ही प्रकट हुए हो! और यह भी स्पष्ट ही है कि दीन-दुखियों पर तुम्हारा बड़ा प्रेम, बड़ी कृपा है। प्रियतम! हम भी बड़ी दुःखिन हैं। तुम्हारे मिलन की आकांक्षा की आग से हमारा वक्षःस्थल जल रहा है। तुम अपनी इन दासियों के वक्षःस्थल और सिर पर अपने कोमल कर कमल रखकर इन्हें अपना लो; हमें जीवनदान दो॥ 41 ॥

 

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