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Why didn’t Hanuman killed Ravan in hindi?

Why didn’t Hanuman killed Ravan in hindi? 

हनुमान ने रावण को क्यों नहीं मारा 

Hanuman ne Ravan ko Kyo nhi mara?

एक प्रश्न दिमाग में आता है कि क्या हनुमानजी रावण को मार सकते थे? तो इसका जवाब आपको जरूर मिलेगा। इस प्रश्न का जवाब खुद श्री हनुमान जी ने भीम को दिया है। इससे पहले आप थोड़ा पढ़िए- जिस समय भगवान श्री राम ने हनुमान जी को सीता माता की खोज के लिए भेजा तो हनुमान जी ने समुद्र को लांघ दिया। फिर विभीषण पर कृपा की और उसके बाद सीता माता से मिले। यहाँ पर हनुमान जी ने सीता जी बताया कि मैं राम का दूत हनुमान हूँ। और भगवान राम की आज्ञा से यहाँ पर आया हूँ। इसके बाद हनुमान जी ने सीता माता से कुछ फल खाने की आज्ञा मांगी। माता ने आज्ञा दी। यहाँ पर हनुमान जी को मेघदूत ने बंधी बना लिया। क्योंकि उन्होंने ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया और हनुमान जी ने इस अस्त्र की लाज रखी।

 

हनुमान जी को बंधी बनाकर रावण की सभा में लाया गया। अगर हनुमान जी यहाँ पर चाहते तो रावण व सबको मार सकते थे लेकिन हनुमान ने नहीं मारा। रावण ने अब हनुमान जी की पूछ में आग लगवा दी। हनुमान जी ने सारी लंका को जलाकर भस्म कर दिया।

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ये बात द्वापर युग की है। उस समय भीम की मुलाकात हनुमान जी से हुई। भीम ने हनुमान जी ने अपना विराट रूप दिखने के आग्रह किया जिस रूप को धारण करके हनुमान जी ने समुद्र को लांघ लिया था। हनुमान जी ने पहले तो मना किया लेकिन फिर भीम के प्रेम को देखकर हनुमान जी ने अपना विशाल शरीर धारण किया।
उनका शरीर लंबाई, चौड़ाई और उंचाई में बहुत बड़ा हो गया। हनुमानजी कदलीवन को आच्छादित करते हुए गन्धमादन पर्वत की उंचाईको भी लांघकर वहां खड़े हो गये। उनका शरीर दूसरे पर्वत के समान प्रतीत होता था।

 

हनुमान जी अपनी विशाल पूंछ को हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओं घेरकर खड़े थे। हनुमानजी के विराट् रूप को देखकर भीम को बड़ा आश्चर्य हुआ। हनुमानजी तेज में सूर्य के समान दिखायी देते थे।

 

उनकी ओर देखकर भीम ने दोनों आंखे बंद कर लीं। तब हनुमान् जी उनसे मुसकराते हुए – तुम यहां मेरे इतने ही बड़े रूपको देख सकते हो, परंतु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूं। मेरे मनमें जितने बड़े स्वरूपकी भावना होती है, उतना ही मैं बढ़ सकता हूं। भयानक शत्रुओं के समीप मेरी मूर्ति अत्यन्त ओजके साथ बढ़ती है’।

 

हनुमान् जी का वह विन्ध्य पर्वतके समान अत्यन्त भयंकर और अद्भूत शरीर देखकर वायुपुत्र भीमसेन घबरा गये। उनके शरीरमें रोंगटे खड़े होने लगे। अब भीमने हाथ जोड़कर हनुमान् जी से कहा- ‘प्रभो! आपके इस शरीरका विशाल प्रमाण प्रत्यक्ष देख लिया। महापराक्रमी वीर! अब आप स्वयं ही अपने शरीको समेट लीजिये। ‘आप तो सूर्यके समान उदित हो रहे हैं। मैं आपकी ओर देख नहीं सकता।

 

‘वीर! आज मेरे मन में इस बातको लेकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि आपके निकट रहते हुए भी भगवान् श्रीरामने स्वयं ही रावण का सामना किया। ‘आप तो अकेले ही सबका नाश कर सकते थे? आपके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। उस ran भूमि में रावण अकेले आपका ही सामना करनेमें समर्थ नहीं था’।

 
भीमके ऐसा कहने पर कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी स्नेहयुक्त गम्भीर वाणी में बोले-प्यारे भीम भाई ! तुम एकदम ठीक बात कहते हो। वह अधम राक्षस हकीकत में मेरा सामना नहीं कर सकता था। लेकिन सम्पूर्ण लोकों को कांटे के समान कष्ट देने वाला रावण यदि मरे ही हाथों मारा जाता, तो भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की कीर्ति नष्ट हो जाती। इसीलिये मैंने उसकी उपेक्षा कर दी। वीरवर श्रीरामचन्दजी सेना सहित उस अधम राक्षस का वध करनेके सीताजी को अपनी अयोध्यापुरी में ले आये। इससे मनुष्यों में उनकी कीर्ति का भी विस्तार हुआ।
यही कारण है कि हनुमान ने रावण को नहीं मारा।
धन्य हैं ऐसे भगवान के भक्त जिन्हे अपने प्रभु श्री राम की कीर्ति की पल-प्रतिपल चिंता रहती हैं। हम मनुष्य तो हमेशा अपनी बड़ाई सुनने के लिए तरसते रहते हैं। थोड़ा सा भी किसी का काम कर दें तो लाख बार गुण गाते हैं। कई बार तो दूसरों के द्वारा किये हुए काम को अपना बताकर उसका श्रेय लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन वास्तव में सच्चा भगवान का भक्त तो वो है जो अपने प्रियतम भगवान को याद करके उनका काम करता रहे।

बोलिये हनुमान जी महाराज की जय !!

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