Devotee Kunti And Krishna

Devotee Kunti And Krishna

Bhagwan Shri Krishna parikshti maharaj ki rakhsa karne ke baad dwarka jane lage hai to marg me aai hai Kunti ji , ye krishan ji ki bua lagti hai – yeh shrimad bhagwat ki story hai ,aap hindi me padhiye.

 

भगवान श्री कृष्ण परीक्षित महाराज की रक्षा करने के बाद जब द्वारका जाने लगे है तो मार्ग में आई है कुंती जी . ये कृष्ण जी की बुआ लगती है । इन्होने रथ को रोक दिया ।  भगवान रथ से उतरे है और बुआ को प्रणाम किया । और कुंती ने भगवान कृष्ण की स्तुति की है- जिसके कुछ अंश इस तरह से है , अंत में पूरी संस्कृत में स्तुति दी गई है-

“कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।         ( krishnay vashudevay devkinandnaye ch:

नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम: ॥”        nand gop kumaraye govindaye namo namh:)

कुंती कहती है हे कृष्ण , हे वाशुदेव, हे देवकीनंदन , हे नन्द के लाला , हे गोविन्द आपको मेरा प्रणाम !

 

“नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने ।      (namh: pankaj nabhaye namh: pankajmaline

नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाड़्घ्रये ।।”       namh pankaj netraye namaste pankajaghrye)

 

जिनकी नाभि से ब्रह्मा का जन्मस्थान कमल प्रकट हुआ है जिन्होँने कमलोँ की माला धारण की है . जिनके नेत्र कमल के समान विशाल और कोमल है और जिनके चरणोँ मेँ कमल चिह्न हैँ ऐसे हे कृष्ण आपको बार बार वंदन है।

 

भगवान बोले की मेरी प्यारी बुआ , तू मेरी इतनी स्तुति कर रही है , क्या बात है ? आपकी कुछ लेने की इच्छा है क्या ? कुंती बोली की आपकी स्तुति कोई तब ही करता है क्या जब किसी को कुछ मांगना हो ? कृष्ण कहते है की हाँ बुआ संसार मे तो यही देखने मे आता है । तब कुंती कहती है अच्छा, मै मांगू तू देगा ना, देख कहीं तेरा हाथ देते देते न रुक जाये ? अब भगवान सोच मे पड़ गए की मेरी बुआ पता नही क्या मांग लेगी और मै दे भी पाउगा या नहीं ।

अब देखिये कुंती जो मांगती है –

“विपद: सन्तु ता: शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।. (vipad: santu ta: sasvatatr tatr jagatguro

भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥”     bhavto darshanam yatsyad punarbhavdarshnam)

 

हे कान्हा तू मुझे कुछ देना चाहता है तो मुझे दुःख दे दे । भगवान बोले की बुआ ये क्या मांग रही है संसार तो मुझसे सुख की कामना करते करते थकता नहीं है और एक तू है जो दुःख मांग रही है । ऐसा वरदान आज तक किसी ने नहीं माँगा होगा ।

कुंती कहती है की मैंने संसार मे देखा है जब सुख होता है तब वो भगवान को भूल जाता है और जब दुःख होता है तो पल पल आपकी याद आती है । ऐसा सुख किस काम का ? जब हमारे जीवन मे दुःख थे तब आप हमारे साथ थे और आज जब सुख आया है तो आप हमे छोड़ कर जा रहे हो ? इसलिए मुझे तुझसे बस दुःख चाहिए – कुंती कहती है की मुझे वो सुख नहीं चाहिए जिसे पाकर मे आपको भूल जाऊ ।

“दुःख मे सुमिरन सब करे सुख मे करे ना कोय, (dukh me sumiran sab kare sukh me kare na koy

जो सुख मे सुमिरन करे तो दुःख कहे हो होए”      jo sukh me sumiran kare to dukh kaahe ho hoye)

“सुख के माथे सील पर जो हरी नाम भुलाये ,     (sukh ke maathe sil pare jo hari naam bhulaye

बलिहारी वा दुःख की जो पल पल नाम रटाये ।।” balihari va dukh ki jo pal pal naam rataye)

हे गोविन्द ऐसा सुख जो आपको भुलाये मुझे नहीं चाहिए , मुझे तो बस दुःख दे दो ।तब भगवान ने मुस्करा दिए है मानो अपनी माया बुआ पर फेर दी है । भगवान कहते है की बुआ मेरे बचपन की बात बताओ ना कुछ । तब कुंती जी भगवान की कुछ बाल लीलाओ को भगवान को याद दिलाती है और भगवान बहुत खुश होते है ।

इस प्रकार आज भगवान नहीं गए है वहीँ पर रुके है ।

 

कुंती स्तुति इस प्रकार है – Kunti Stuti Of Krishna

श्रीमद्भागवतपुराण कुंती कृत श्रीकृष्ण स्तुति

कुन्त्युवाच:

नमस्ये पुरुषं त्वद्यमीश्वरं प्रकृते: परम् ।

अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवास्थितम् ॥1॥

 

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाटयधरो यथा ॥2॥

 

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रिय: ॥3॥

 

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम: ॥4॥

 

नम: पङ्कजनाभाय नम: पङ्कजमालिने ।
नम: पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रये ॥5॥

 

यथा हृषीकेश खलेन देवकी कंसेने रुद्धातिचिरं शुचार्पिता ।
विमोचिताहं च सहात्मजा विभो त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात् ॥6॥

 

विषान्महाग्ने: पुरुषाददर्शनादसत्सभाया वनवासकृच्छ्रत: ।
मृधे मृधे sनेकमहारथास्त्रतो द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरे sभिसक्षिता: ॥7॥

 

विपद: सन्तु ता: शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥8॥

 

जन्मैश्वर्यश्रितश्रीभिरेधमानमद: पुमान् ।
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम् ॥9॥

 

नमो sकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नम: ॥10॥

 

मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम् ।
समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथ: कलि: ॥11॥

 

न वदे कश्चद्भगवंश्चिकीर्षितं तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम् ।
न यस्य कश्चिद्दयितो sस्ति कहिर्चिद् द्वष्यश्च यस्मिन्विषमा मतिर्नृणाम् ॥12॥

 

जन्म कर्म च विश्वात्मन्नकस्याकर्तुरात्मन: ।
तिर्यङ्नृषिषु याद: स तदत्यन्तविडम्बनम् ॥13॥

 

गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद्या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनासम्भ्रमाक्षम् ।
वक्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्बभेति ॥14॥

 

केचिदाहुरजं जातं पुण्यश्लोकस्य कीर्तये ।
यदो: प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम् ॥15॥

 

अपरे वसुदेवस्य देवक्यां याचितो sभ्यगात् ।
अजस्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम् ॥18॥

 

भारावतारणायान्ये भुवो नाव इवोदधौ ।
सीदन्त्या भूरिभारेण जातो ह्यात्मभुवार्थित: ॥19॥

 

भवे sस्मिन्क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभि: ।
श्रवणस्मणार्हाणि करिष्यन्नति केचने ॥20॥

 

शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णश: स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जना: ।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥21॥

 

अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित प्रभो जिहाससि स्वित्सुहृदो sनुजीविन: ।
येषां न चान्यद्भवत: पदाम्बुजात्परायणं राजसु योजितांहसाम् ॥22॥
के वयं नामरूपाभ्यां यदुभि: सह पाण्डवा: ।

भवतो sदर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितु: ॥23॥

 

नेयं शोभिष्यते तत्र यथेदानीं गदाधर ।
त्वत्पदैरङ्किता भाति स्वलक्षणविलक्षितै: ॥24॥

 

इमे जनपदा: स्वृद्धा: सुपक्वौषधिवीरुध: ।
वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितै: ॥25॥

 

अथ विश्वेश विश्वात्मन्विश्वमूर्ते स्वकेषु मे ।
स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढं पाण्डुषु वृष्णषु ॥26॥

 

त्वयि मे sनन्यविष्या मतिर्मधुपते sसकृत् ।
रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति ॥27॥

 

श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनिध्रुग्राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य ।
गोविन्द गोद्विजसुरार्तिहरावतार योगेश्वराखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥28॥

 

इति श्रीकुन्ति कृत श्रीकृष्ण स्तुति: सम्पूर्णम्

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