Bhishma Pitamah Stuti in Hindi and Sanskrit

Bhishma Pitamah Stuti in Hindi and Sanskrit

भीष्म पितामह जी की स्तुति हिंदी और संस्कृत में 

 

श्री भीष्म पितामह जी ने अंत समय में भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत स्तुति की है। जो भी भक्त इस स्तुति को ह्रदय से पढ़ेगा, या सुनेगा और याद करके जीवन में उतारेगा उसके ह्रदय में भगवान श्री कृष्ण विराजमान रहेंगे। मेरे पूज्य गुरुदेव से जो भी मैंने सीखा वो आज आपके सामने रख रहा हूँ। भीष्म पितामह जी की स्तुति में 4(चार) चीजे प्रमुख हैं।  1. इति 2. मति(बुद्धि) 3. रति(प्रेम) 4. गति

 

  1. इति– भीष्म जी अपनी स्तुति इति शब्द से शुरू करते हैं। जिसका अर्थ होता हैं अंत। The End. मानो भीष्म पितामह जी कहते हैं प्रभु मेरे अब तक की स्तुति पूरी थी या नही थी वो आप जानो लेकिन ये मेरी अंतिम स्तुति हैं। इसके बाद में स्तुति नही कर पाउँगा।

 

  1. मति — भीष्म पितामह जी ने कहा की मेरी एक बेटी हैं। मैं चाहता हूँ जिसका विवाह आपके साथ हो।

कृष्ण जी कहते हैं- बाबा! मैंने तो सुना था आप आजीवन ब्रह्मचारी रहे हैं। फिर आपकी बेटी कहाँ से आ गई?

भीष्म जी बोल पड़े– कहते हैं की कान्हा! मेरी बेटी ओर कोई नहीं बल्कि मेरी बुद्धि हैं। आप उससे विवाह करलो। क्योंकि मैं नही चाहता की मेरी ये बेटी और किसी के साथ ब्याही जाये। आपके चरणों में मेरी मति(बुद्धि) समर्पित हैं।

 

  1. रति — भीष्म जी कहते हैं प्रभु मेरी अगर कहीं रति(प्रेम) हो तो केवल और केवल आपमें हो। क्योकि केवल आपसे ही प्रेम सार्थक हैं।

 

  1. गति– अंत में भीष्म पितामह जी कहते हैं की प्रभु! मेरी गति भी आप में ही होनी चाहिए। मेरा अंत समय हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ की आपके श्री चरणों में मेरी गति हो जाये। आप ही एकमात्र मेरे आश्रय हैं। और जो इन तीनों(इति, मति और रति) आपको सोंप देगा । मैं जनता हूँ की हे प्रभु! आप उसकी सद्गति ही करोगे। 

 

इस प्रकार भीष्म पितामह जी ने 11(ग्यारह) श्लोक में स्तुति की हैं। नीचे पूरी स्तुति संस्कृत और हिंदी में दी गई हैं। आप दर्शन कीजिये।

 

 

श्री भीष्म उवाच –

इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वत पुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥१॥ (Iti matirup kalpita vitirshna bhagwati satvat pungave vibhumini.)

अर्थ : भीष्मजी ने कहा—अब मृत्यु के समय मैं अपनी यह बुद्धि, जो अनेक प्रकार के साधनों का अनुष्ठान करने से अत्यन्त शुद्ध एवं कामनारहित हो गयी है, यदुवंशशिरोमणि अनन्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित करता हूँ, जो सदा-सर्वदा अपने आनन्दमय स्वरूप में स्थित रहते हुए ही कही विहार करने की—लीला करने की इच्छा से प्रकृति को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे यह सृष्टि परम्परा चलती है ।(1)

 

 

त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥२ ॥

भीष्म जी कहते हैं प्रभु! आप त्रिभुवन-सुन्दर हैं , तीनों लोकों में आपसे सुंदर कोई नहीं हैं। और आपका शरीर  तमाल के वृक्ष के समान सांवला है, जिस पर सूर्यरश्मियों के समान श्रेष्ठ पीताम्बर लहराता रहता है और कमल-सदृश मुख पर घुँघराली अलकें लटकती रहती हैं उन अर्जुन-सखा श्रीकृष्ण में मेरी निष्कपट प्रीति हो ।(2)

 

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युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलंकृतास्ये । मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥३॥

 

मुझे युद्ध के समय की उनकी वह विलक्षण छबि याद आती है। उनके मुख पर लहराते हुए घुन्घ्राले बाल घोंड़ो की टॉप की धूल से मटमैले हो गये थे और पसीने की छोटी-छोटी बूँधें शोभायमान हो रही थीं। मैं अपने तीखे बाणों से उनकी त्वचा को बींध रहा था। उन सुन्दर कवच मण्डित भगवान श्रीकृष्ण के प्रति मेरा शरीर, अन्तःकरण और आत्मा समर्पित हो जायँ ।(3)

 

 

सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थ सखे रतिर्ममास्तु ॥४॥

अपने मित्र अर्जुन की बात सुनकर, जो तुरंत ही पाण्डव-सेना और कौरव-सेना के बीच में अपना रथ ले आये और वहाँ स्थित होकर जिन्होंने अपनी दृष्टि से ही शत्रुपक्ष के सैनिकों की आयु छीन ली, उन पार्थ सखा भगवान श्रीकृष्ण में मेरी परम प्रीति हो ।(4)

 

 

 

व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या। कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥५॥

अर्जुन ने जब दूर से कौरवों की सेना के मुखिया हम लोगों को देखा तब पाप समझकर वह अपने स्वजनों के वध से विमुख हो गया। उस समय जिन्होंने गीता के रूप में आत्माविद्या का उपदेश करके उसके सामयिक अज्ञान का नाश कर दिया, उन परमपुरुष भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रीति बनी रहे ।(5)

 

 

 

 

 

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः । धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलत्गुः हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥६॥

मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी कि मैं श्रीकृष्ण को शस्त्र ग्रहण कराकर छोडूँगा; उसे सत्य एवं ऊँची करने के लिये उन्होंने अपनी शस्त्र ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा तोड़ दी। उस समय वे रथ से नीचे कूद पड़े और सिंह जैसे हाथी को मारने के लिये उस पर टूट पड़ता है, वैसे ही रथ का पहिया लेकर मुझ पर झपट पड़े। उस समय वे इतने वेग से दौड़े कि उनके कंधे का दुपट्टा गिर गया और पृथ्वी काँपने लगी।(6)

 

 

 

शितविशिखहतोविशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥७॥

मुझ आततायी ने तीखे बाण मार-मारकर उनके शरीर का कवच तोड़ डाला था, जिससे सारा शरीर लहूलुहान हो रहा था, अर्जुन के रोकने पर भी वे बलपूर्वक मुझे मारने के लिये मेरी ओर दौड़े आ रहे थे। वे ही भगवान श्रीकृष्ण, जो ऐसा करते हुए भी मेरे प्रति अनुग्रह और भक्तवत्सलता से परिपूर्ण थे, मेरी एकमात्र गति हों—आश्रय हों ।(7)

 

 

 

 

विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये। भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः यमिह निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ॥८॥

अर्जुन के रथ की रक्षा में सावधान जिन श्रीकृष्ण के बायें हाथ में घोडों की रास थी और दाहिने हाथ में चाबुक, इन दोनों की शोभा से उस समय जिनकी अपूर्व छवि बन गयी थी, तथा महाभारत युद्ध में मरने वाले वीर जिनकी इस छवि का दर्शन करते रहने के कारण सारुप्य मोक्ष को प्राप्त हो गये, उन्हीं पार्थ सारथि भगवान श्रीकृष्ण में मुझ मरणासन्न की परम प्रीति हो ।(8)

 

 

 

ललित गति विलास वल्गुहास प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥९॥

जिनकी लटकीली सुन्दर चाल, हाव-भाव युक्त चेष्टाएँ, मधुर मुसकान और प्रेमभरी चितवन से अत्यन्त सम्मानित गोपियाँ रासलीला में उनके अन्तर्धान हो जाने पर प्रेमोन्माद से मतवाली होकर जिनकी लीलाओं का अनुकरण करके तन्मय हो गयी थीं, उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण में मेरा परम प्रेम हो ।(9)

 

 

 

 

मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशि गोचर एष आविरात्मा ॥१०॥

जिस समय युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ हो रहा था, मुनीयों और बड़े-बड़े राजाओं से भरी हुई सभा में सबसे पहले सबकी ओर से इन्हीं सबके दर्शनीय भगवान श्रीकृष्ण की मेरी आँखों के सामने पूजा हुई थी; वे ही सबके आत्मा प्रभु आज इस मृत्यु के समय मेरे सामने खड़े हैं ।(10)

 

 

 

तमिममहमजं शरीरभाजां हृदिहृदि धिष्टितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥११॥

जैसे एक एक ही सूर्य अनेक आँखों से अनेक रूपों में दीखते हैं, वैसे ही अजन्मा भगवान श्रीकृष्ण अपने ही द्वारा रहित अनेक शरीरधारियों के हृदय में अनेक रूप-से जान पड़ते हैं; वास्तव में तो वे एक और सबके हृदय में विराजमान हैं ही। उन्हीं इन भगवान श्रीकृष्ण को मैं भेद-भ्रम से रहित होकर प्राप्त हो गया हूँ ।(11)

 

 

इस प्रकार भीष्मपितामह ने मन, वाणी और दृष्टि की वृत्तियों से आत्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण में अपने-आपको लीन कर दिया। उनके प्राण वहीं पर विलीन हो गये और वे शान्त हो गये । उन्हें अनन्त ब्रम्ह में लीन जानकर सब लोग वैसे ही चुप गये, जैसे दिन बीत जाने पर पक्षियों का कलरव शान्त हो जाता है । उस समय देवता और मनुष्य नगारे बजाने लगे। साधुस्वभाव के राजा उनकी प्रशंसा करने लगे और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

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Read : भगवान को पाने का तरीका 

12 thoughts on “Bhishma Pitamah Stuti in Hindi and Sanskrit

  1. Thank you for posting Bhishma Stuti

    I always listen to sung by bhaishri Rameshbhai Oza. My Favorite.

    🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

  2. I want a printout of bhishma pitamah stuti to lord krishna for myself . It is my request . Jai Shri Krishna
    Thank you .

    • श्री भीष्म उवाच –

      इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वत पुङ्गवे विभूम्नि ।
      स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ ३२॥

      त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने ।
      वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥ ३३॥

      युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलंकृतास्ये ।
      मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३४॥

      सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य ।
      स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थ सखे रतिर्ममास्तु ॥ ३५॥

      व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या।
      कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ३६॥

      स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः ।
      धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलत्गुः हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ३७॥

      शितविशिखहतोविशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।
      प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ३८॥

      विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये।
      भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः यमिह निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ॥ ३९॥

      ललित गति विलास वल्गुहास प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः ।
      कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥ ४०॥

      मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् ।
      अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशि गोचर एष आविरात्मा ॥ ४१॥

      तमिममहमजं शरीरभाजां हृदिहृदि
      धिष्टितमात्मकल्पितानाम् ।
      प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ ४२॥

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